जब जीवन उलझनों से भर जाए, मन अशांत हो और रास्ता साफ न दिखे—
तब संत कबीर के आध्यात्मिक दोहे दीपक की तरह मार्ग दिखाते हैं।
सरल शब्दों में कही गई गहरी बातें, जो सीधे मन और आत्मा को छू जाती हैं।
इस ब्लॉग में आप पढ़ेंगे कबीर के आध्यात्मिक दोहे अर्थ सहित इन हिंदी I जीवन बदलने वाले विचार, उनके अर्थ और भावार्थ, जो आज के जीवन में भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
कबीर के प्रसिद्ध आध्यात्मिक दोहे, उनके अर्थ और भावार्थ,
1. मन चलतां तन भी चलै
ताते मन को घेर
तन मन दोऊ बसि करै
राइ होय सूमेर ।।
कबीर के दृष्टिकोण- मनुष्य के यह शरीर मन के अनुसार ही चलता है। इसलिए पहले मन को अनुशासित और नियंत्रण करने की कोशिश करिए। जो आदमी अपने शरीर और मन दोनों को वश में कर लेता है, वह जल्दी ही राई से सुमेरु पर्वत के समान वैभववान बन जाता है।
मेरा दृष्टिकोण – हमारा अस्तित्व तन(शरीर) और मन दोनों से है। No doubt कबीर बिल्कुल सही कहा है मन चलता है तो शरीर भी चलता है। आगे कबीर कहते हैं कि जो शरीर और मन दोनों को वश में कर सकता है वह राई से सुमेरु बन सकता है। यहीं पर फर्क आ जाता है आम पुरुष और महापुरुष में ।
क्योंकि तन (शरीर) और मन पर नियंत्रण करने के लिए दृढ़ संकल्प के साथ अभ्यास करना पड़ता है।
एक बार जब इस सूत्र को जो आत्मसात कर लेता है उसे महापुरुष बनने में समय नहीं लगता है।
उदाहरण के लिए – चाणक्य ने चंद्रगुप्त को कुछ इसी तरह का प्रशिक्षण दिया था।
इसके अलावा इतिहास में जितने भी योद्धा ने इतिहास में अपनी जगह बनाई है क्योंकि उसने अपने तन मन पर नियंत्रण कर पाया था।
राणा प्रताप सिंह भी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है जिसने एक ही वार में घोड़ा और सेनापति दोनों को बीचोबीच चीर दिया था।
टीपू सुल्तान भी एक ऐसे योद्धा थे जिनके सिर कट जाने के बाद भी शरीर से युद्ध किया था।
ऐसा नहीं है कि असंभव है किंतु आसान भी नहीं है।
इसे केवल अनुशासन को दृढ़ संकल्प के साथ पालन करने पर जो तन मन पर नियंत्रण पा लिया उसका सुमेरू पर्वत जैसा प्रसिद्धि मिलना तय है।
अधिकतर सफल व्यक्ति इसे अपने जीवन में अवश्य लागू करता है।
2. सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदय सांच है, ताके हिरदय आप।।
कबीर कहते हैं कि यदि आपके विचारों में सच्चाई नहीं है तो व्रत, तप, तीर्थ, यज्ञ, हवन, धार्मिक कर्मकांड, नमाज, अरदास से कोई फायदा नहीं होता है। वे हमेशा सत्य विचार को जीवन के लिए अहम मानते थे।
मेरे दृष्टिकोण से महात्मा गांधी और महात्मा बुद्ध के साथ कई संत इस दोहे के सटीक और अमूल्य उदाहरण है। जिन्होंने केवल सत्य विचार पर अमल करके जीवन को सार्थक किया। कहानियों में सत्य हरिश्चंद्र की कथा इसे पूरी तरह चरितार्थ किया है। हां ये भी परम सत्य है कि ये एवरेस्ट पर्वत पर चढ़ने की कठिनाई से भी ज्यादा कठिन है। मगर असंभव भी नहीं है।
3. जहाँ दया वहाँ धर्म है , जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ आप।।
कबीर कहते हैं – जहाँ दया है वह धर्म की जड़ है। जहाँ पाप है वह संताप अर्थात दुःख की जड़ है। जहाँ क्षमा है वो भी धर्म है जब भी कहीं दया की जरूरत होगी वहां खुद को पाते हैं।
मेरे दृष्टिकोण से जब भी कोई व्यक्ति किसी पर दया करता है। दया के पात्र व्यक्ति से आंतरिक ख़ुशी की धारा बहती है और उस व्यक्ति के लिए आशीर्वाद निकलता है। और जब भी किसी भी व्यक्ति के साथ पाप मूलक विचार का व्यवहार करते हैं। जिसके साथ पाप मूलक व्यवहार करते हैं उसके हृदय में वेदना का ज्वाला फुटता है जो अभिशाप बनकर निकलता है। इसी तरह जब किसी अभद्र व्यवहार को बर्दास्त करते हुए क्षमा करते हैं तो क्षमाप्रार्थी व्यक्ति के हृदय से आशीर्वाद निकलता है। इसलिए जब कभी जीवन में दया और क्षमा की जरूरत होती है उसे सबसे पहले मिलता है।जिसके लिए लोग दुआएं करते हैं।
4. जैसी प्रीत कुटुंब सो , तैसी हरि सो होय।
दास कबीरा यूँ कहे काज न बिगड़े कोय।।
कबीर कहते है – जिस तरह से आप कुटुंब या अतिथि से लगाव , प्रेम रखते हैं,
वही लगाव यदि ईश्वर से रखते हैं तो आपका कोई कार्य नहीं बिगड़ता है।
बल्कि भीड़ में सबसे पहले आपका कार्य होता है।
कबीर भजन लिखित अर्थ सहित
- मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे , मैं तो तेरे पास में।
ना देवल में ना मस्जिद में , ना काबे कैलाश में।।
खोजि होय तो तुरंत मिलि हौं , पल भर की तलाश में।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो , सब साँसन की साँस में।।
कबीर के अनुसार – ईश्वर कहते हैं तुम मुझे कहाँ ढूँढ रहे हो मैं तो तुम्हारे पास हूँ।
ना मैं मंदिर में , ना मजीद में ना मक्का मदीना में और ना ही कैलाश पर्वत पर मिलूंगा।
जब भी मुझे खोजोगे हर पल हर साँस में मिलूंगा। मेरे विचार से यही सही है।
कबीर के मन
- मन ऐसा निर्मल भया , जैसे गंगा नीर।
पीछे -पीछे हरि फिरें , कहत कबीर-कबीर।।
कबीर कहते हैं एक बार जब मन निर्मल अर्थात पवित्र हो जाता है जैसे गंगाजल होता है।
तो भगवान खुद पवित्र आत्मा के नाम पुकारते हुए पीछे पीछे चलते हैं।जैसे कबीर के साथ भी हुआ था।
2. अष्ट सिद्धि नव निधि लौं , सबही मोह की खान।
त्याग मोह की वासना , कहैं कबीर सुजान।।
कबीर कहते हैं कि अष्ट सिद्धियाँ (आठ प्रकार की अलौकिक शक्तियाँ) और
नव निधियाँ (नौ प्रकार के अपार धन जैसे पद ,पैसा, प्रसिद्धि , फॉलोवर्स ) भी अंततः मोह (आसक्ति) को ही बढ़ाने वाली हैं।
यदि मनुष्य इन सबको पाने की इच्छा छोड़ दे और मोह की वासना का त्याग कर दे,
तभी वह वास्तव में बुद्धिमान (सुजान) कहलाता है।कबीर हमें सिखाते हैं कि इनका उपयोग करो,
लेकिन इनके इर्द गिर्द अपनी दुनिया मत बनाओ। आखिरकार आंतरिक शांति और विवेक ही सच्ची सफलता है।
कबीर के 7 विचार दोहा
- केवल सत्य विचारा , जिनका सदा अहारा।
कहे कबीर सुनो भाई साधो ,तरे सहित परिवारा।।
कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति केवल सत्य का ही चिंतन करता है
और जिसके जीवन का आधार (आहार) सत्य विचार , सत्य आचरण ,सत्य वाणी , सत्य कर्म ही है,
और सब कुछ सत्य से जुड़ा होता है वो मनुष्य अंदर से दृढ संकल्पित और शांत और अनुशासित होता है।
ये व्यक्ति न केवल स्वयं संसार-सागर से पार होता है,
बल्कि अपने परिवार और आसपास के लोगों को भी साथ लेकर उद्धार की ओर ले जाता है।
2. न्हाय धोए क्या भया , जो मन मैला न जाय।
मीन सदा जल में रहै , धोए बास न जाय।।
कबीर कहते हैं – जैसे हमेशा जल में धुलकर भी मछली की दुर्गन्ध समाप्त नहीं होता है।
उसी तरह पवित्र नदियों में शारीरिक मैल धो लेने से कल्याण नहीं होता है।
इसके लिए भक्ति-साधना से मन का मैल साफ़ करना पड़ता है।
3. भक्ति बिगाड़ी कामिया , इंद्रिन केरे स्वाद।
हीरा खोया हाथ सों , जनम गंवाया बाद।।
कबीर कहते हैं कि भोग, मनोरंजन, सोशल मीडिया, लालच और त्वरित सुख
आधुनिक इंद्रिय-स्वाद कामनाएँ (वासना, इच्छाएँ) मनुष्य की भक्ति को नष्ट कर देते हैं।
इन क्षणिक सुखों के पीछे भागते-भागते मनुष्य अपने हाथ में आया हुआ अमूल्य हीरा समान मानव जन्म गँवा देता है और बाद में केवल पछतावा रह जाता है।
क्योंकि जब मन इच्छाओं से भरा रहता है, तो ईश्वर-स्मरण और साधना कमजोर हो जाती है।
आँख, कान, जीभ, त्वचा और नाक के सुख मन को बाँध लेते हैं।
मानव जीवन दुर्लभ और बहुमूल्य है, जैसे हीरा जीवन बीत जाने के बाद समझ आती है, पर तब अवसर निकल चुका होता है।
4. काम क्रोध मद लोभ की , जब लग घट में खान।
कबीर मूरख पंडिता , दोनों एक समान।।
कबीर कहते हैं – जब तक शरीर में काम ,क्रोध, लोभ, मद और मोह जैसे विकारों का संग्रह है
तब तक मूर्ख और पंडित दोनों एक सामान है।
अर्थात संकोच से उबरकर सत्य ज्ञान से इन विकारों पर जीत हासिल कर लिया वह पंडित है और जो इनमे फंसा रहा वो मुर्ख है।
5. माया मन की मोहिनी , सुर नर रहे लुभाय।
इन माया सब खाइया , माया कोय न खाय।।
मन को मोहनेवाली माया ठगनेवाली है। देवता ,मनुष्य , राक्षस अदि सभी को अपने वश में कर लेती है।
यह माया सबको जीत लेती है। लेकिन इसे कोई नहीं जीत पाता ।
माया मन को भ्रमित करने वाली शक्ति है, जो असत्य को सत्य जैसा दिखाती है।
केवल सामान्य लोग ही नहीं, बड़े-बड़े ज्ञानी और शक्तिशाली भी इससे प्रभावित हो जाते हैं।
माया सबको निगल जाती है; अहंकार, लोभ और आसक्ति बढ़ाती है।
बहुत दुर्लभ व्यक्ति ही ऐसा होता है जो विवेक और भक्ति से माया को जीत सके।
कबीर का संदेश है—माया से भागो नहीं, उसे पहचानो और उसके पार जाओ।
6. माया तो ठगनी भई , ठगत फिरै सब देश।
जा ठग ने ठगनी ठगी , ता ठग को आदेश।।
कबीर कहते हैं – माया का स्वभाव ही धोखा देना है।
वह हर जगह, हर व्यक्ति को भ्रम में डालती है।
जो व्यक्ति माया की चाल को पहचानकर उससे ऊपर उठ जाता है।
वही व्यक्ति समाज और आध्यात्मिक मार्ग में आदर्श माना जाता है।
पैसा, पद, प्रतिष्ठा, उपभोग, और दिखावा
माया के आधुनिक रूप हैं।
जो इनसे अंधा होकर जीता है, वह ठगा जाता है।
जो इनका उपयोग करता है पर इनका गुलाम नहीं बनता,
वही माया को ठगने वाला है।
7. जिनके नाम निशान है , तीन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया , मिटि गया आवा गौन।।
कबीर कहते हैं कि जिनके हृदय में ईश्वर के नाम की सच्ची छाप (निशान) लग चुकी है,
उन्हें तीन बंधन—देह, मन और माया — कोई भी उसे बांध नहीं सकते।
जिस व्यक्ति को परम पुरुष (ईश्वर) का खजाना मिल गया,
उसके लिए जन्म-मरण का चक्र (आवागमन) समाप्त हो जाता है।
आज के समय में:
बाहरी साधन, ज्ञान और उपलब्धियाँ अस्थायी हैं।
नाम-स्मरण ,विवेक ,आचरण ये तीनों जब जीवन का हिस्सा बनते हैं,
तभी भीतर स्थिरता और भय-मुक्ति आती है।
ऐसा व्यक्ति परिस्थितियों से ऊपर उठ जाता है।
कबीर दास के दोहे
8. खुलि खेलो संसार में बांध सकै न कोय।
जाट जगाती क्या करै, सिर पर पोट न कोय।।
कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति आंतरिक रूप से स्वतंत्र हो गया है,
जो संसार में खुले मन और निर्भय और निडर होकर जीता है,
उसे कोई भी बंधन में नहीं बाँध सकता।
मानो सिर पर कोई बोझ रखा ही न हो,
तो कोई चौकीदार (जाट/जगाती) उससे कर या पूछताछ क्या करेगा?
आज के समय में:
जब व्यक्ति अपेक्षाओं, दिखावे और संग्रह की चिंता से मुक्त होता है,
तब समाज, सिस्टम या परिस्थितियाँ उसे मानसिक रूप से बाँध नहीं पातीं।
आंतरिक स्वतंत्रता ही सच्ची आज़ादी है — यही कबीर का संदेश है।
9. काल फिरै सिर ऊपरे , हाथों धरी कमान।
कहै कबीर गहु नाम को , छोड़ सकल अभिमान।।
कबीर कहते हैं कि मृत्यु (काल) हर समय मनुष्य के सिर पर मँडराती रहती है,
मानो उसके हाथ में धनुष तना हो और वह कभी भी बाण छोड़ सकती है।
इसलिए हे मनुष्य! संकोच छोडो। ईश्वर के नाम को दृढ़ता से पकड़ो
और सारे अहंकार, घमंड और अभिमान को छोड़ दो—यही जीवन का सच्चा सहारा है।
जीवन क्षणभंगुर है ,अभिमान सबसे बड़ा बंधन है,
नाम-स्मरण ही स्थायी सहारा है
10. कबीर यह मन मसखरा , कहूँ तो मानै रोस।
जा मारग साहिब मिलै , तहाँ न चालै कोस।।
कबीर कहते हैं कि यह मन बड़ा मजाकिया और चंचल है।
इसे समझाओ तो यह रूठ जाता है, विरोध करने लगता है।
और जिस मार्ग पर चलने से ईश्वर (साहिब) की प्राप्ति होती है,
उस कठिन और सूक्ष्म मार्ग पर यह मन एक कदम भी चलने को तैयार नहीं होता।
मन तुरंत सुख, आराम और मनोरंजन चाहता है।
अनुशासन, ध्यान, आत्मचिंतन से यह दूर भागता है।
कबीर हमें सिखाते हैं कि मन सबसे बड़ा मित्र भी है, शत्रु भी
ईश्वर-मार्ग आसान नहीं, पर सच्चा है
मन को समझाना नहीं, बल्कि साधना सिखाना है।
मन से संघर्ष किए बिना आत्मिक उन्नति संभव नहीं।
कबीर के दोहे साखी
11. संसारी से प्रीतड़ी , सरै न एकौ काम।
दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम।।
कबीर कहते हैं कि यदि मनुष्य का प्रेम और आसक्ति सांसारिक विषयों में ही लगी रहे,
तो कोई भी कार्य सही ढंग से नहीं बनता।
जो व्यक्ति माया और राम—दोनों को एक साथ पाने की कोशिश करता है,
वह अंततः दुविधा में पड़कर दोनों से ही वंचित रह जाता है—
न उसे माया मिलती है, न ईश्वर।
लोग आध्यात्म भी चाहते हैं और
बिना संयम के भोग भी।
यह आंतरिक संघर्ष जीवन को असंतुलित बना देता है।
कबीर का संदेश है—
स्पष्टता चुनो: या तो पूरी निष्ठा रखो , या ईमानदारी स्वीकार करो ।
कबीर दोहे हिंदी
12. भय से भक्ति करैं सबै , भय से पूजा होय।
भय पारस जीव को , निरभय होय न कोय।।
कबीर कहते हैं कि अधिकतर लोग डर के कारण ही भक्ति और पूजा करते हैं—
डर कि कहीं दुख न आ जाए, दंड न मिल जाए, या हानि न हो जाए।लोग पूजा इसलिए करते हैं कि
“अगर न की तो कुछ बुरा न हो जाए।”
यह आस्था नहीं, असुरक्षा है।
यह भय मनुष्य के जीवन को पूरी तरह जकड़ लेता है,
और इस भय से ग्रस्त प्राणी कभी भी निरभय (निर्भीक, मुक्त) नहीं हो पाता।
13. यह बिरियाँ तो फिरि नहिं , मन में देखु विचार।
आया लाभही कारनै , जनम जुआ मति हार।।
कबीर कहते हैं कि यह मानव जीवन बार-बार नहीं मिलता,
इसलिए मन में गंभीरता से विचार करो।
मनुष्य इस संसार में लाभ (आत्मिक उपलब्धि) पाने के लिए आया है,
पर यदि उसने विवेक न रखा तो यह जन्म जुए की तरह हार जाता है।
आज के समय में:
लोग जीवन को केवल कमाई, उपभोग और मनोरंजन में लगा देते हैं।
कबीर हमें याद दिलाते हैं कि
मानव जन्म एक अवसर है, खेल नहीं।
सही दिशा और विवेक न हो तो पूरा जीवन दाँव पर लग जाता है।
कबीर के दोहे pdf
14. झूठा सब संसार है ,कोउ न अपना मीत।
राम नाम को जानि ले , चलै सो भौजल जीत।।
कबीर कहते हैं कि यह संसार नश्वर और स्वार्थ से प्रेरित है;
यहाँ कोई भी सदा के लिए अपना मित्र नहीं होता।
जो व्यक्ति ईश्वर के नाम और सत्य को पहचान लेता है,
वह इस संसार-सागर (भवजल) को पार कर लेता है और जीवन में विजयी होता है।
संसार अस्थायी है, ईश्वर का नाम ही सहारा है।
15. ऐसी बानी बोलिए , मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै ,आपहु शीतल होय।।
कबीर कहते हैं कि ऐसे शब्द बोलने चाहिए,
जिनमें घमंड न हो और जो दूसरों को सुकून और शांति दें।
जो वाणी दूसरों को सुखद अहसास वाली ठंडक देती है,
वही बोलने वाले के मन को भी शांत और निर्मल बना देती है।
मधुर वाणी और अहंकार-त्याग से शांति मिलती है।
16. जग में बैरी कोय नहीं , जो मन शीतल होय।
या आपा को डारि दे , दया करे सब कोय।।
कबीर कहते हैं कि यदि मनुष्य का मन शांत और निर्मल हो जाए,
तो संसार में उसे कोई शत्रु दिखाई नहीं देता।
जो अपने अहंकार को त्याग देता है और
सबके प्रति दया का भाव रखता है,
उसके लिए पूरा संसार मित्रवत बन जाता है।
दया और शीतल मन से शत्रु मिट जाते है।
17. इष्ट मिले अरु मन मिले , मिले सकल रस रीति।
कहै कबीर तँह जाइए , यह संतन की प्रीति।।
कबीर कहते हैं कि जहाँ
मन एक-दूसरे से जुड़ते हैं,
आत्मिक प्रेम और आनंद की अनुभूति होती है,
और जीवन का सारा रस वहाँ मिल जाता है—
वही स्थान संतों का सच्चा संग है,
और वहीं जाना चाहिए। संतों का संगत जीवन को पूर्णता देता है
निष्कर्ष
संत कबीरदास के आध्यात्मिक दोहे केवल काव्य नहीं,
बल्कि जीवन को जाग्रत करने वाली चेतना हैं।
वे हमें सिखाते हैं कि—
- माया से ऊपर कैसे उठें
- अहंकार और भय से कैसे मुक्त हों
- सत्य, दया और प्रेम को जीवन का आधार कैसे बनाएं
आज के तनावपूर्ण और भौतिक युग में
कबीर के दोहे आत्मा के लिए औषधि की तरह हैं।
जो व्यक्ति इनके अर्थ और भावार्थ को जीवन में उतार लेता है,
वह भीतर से शांत, संतुलित और सचेत बन जाता है।
कबीर की वाणी पढ़िए नहीं, जीने का अभ्यास कीजिए।