क्यों स्वतंत्रता और स्वाभिमान के पुजारी महाराणा प्रताप की वीरता के दोहे, कविता और हिस्ट्री के कसीदे पढ़ना चाहिए ?
जानें कैसे ज्योतिष की भविष्यवाणी जो 100 % सच साबित हुई ?
महाराणा प्रताप का जन्म, उससे जुड़ी परिस्थितियाँ और ज्योतिषीय की स्वाभाविक भविष्यवाणियाँ इतिहास और लोककथाओं दोनों में विशेष महत्व रखती हैं।
आइए इस ब्लॉग में बिना संकोच के इसे सरल और स्पष्ट रूप में समझते हैं ।
महाराणा प्रताप हिस्ट्री हिंदी
“महाराणा प्रताप इमेज फोटो”
महाराणा प्रताप का जन्म कब हुआ था ?
महाराणा प्रताप का जन्म तिथि: 9 मई 1540 ईस्वी
वे महाराणा उदय सिंह द्वितीय और माता जयवंता बाई के पुत्र थे।
महाराणा प्रताप का जन्म कहाँ और कैसे हुआ था ?
स्थान: कुंभलगढ़ किला (राजस्थान)
- महाराणा प्रताप का जन्म एक ऐसे कालखंड में हुआ था जब मेवाड़ पर संकट और अस्थिरता का दौर था ।
- चित्तौड़ संकट के दौर से गुजर रहा था।
- चहुँ ओर से शत्रुओं का खतरा बना हुआ था ।
- उनके पिता उदयसिंह ने अपनी सत्ता को सुरक्षित करने के लिए कुंभलगढ़ को अपना केंद्र बनाया था।
- इसलिए उनका जन्म राजमहल की बजाय किले (कुंभलगढ़) में हुआ
- जयवंता बाई स्वयं एक अत्यंत धार्मिक और स्वाभिमानी महिला थीं, जिनका प्रभाव प्रताप के संस्कारों पर बचपन से ही पड़ा।
- लोक कथाओं के अनुसार, उनके जन्म के समय पूरे मेवाड़ में हर्षोल्लास छा गया था ।
- क्योंकि राज्य को एक सशक्त उत्तराधिकारी की प्रतीक्षा थी।
यह दर्शाता है कि उनका जन्म ही संघर्ष और युद्धकालीन परिस्थितियों में हुआ था ।
महाराणा प्रताप के बारे में ज्योतिषियों की भविष्यवाणी क्या थी ?
महाराणा प्रताप का जन्म और उनसे जुड़ी ज्योतिषीय भविष्यवाणियाँ भारतीय इतिहास और लोकश्रुतियों का एक अत्यंत रोचक अध्याय हैं।
- अखंड स्वाभिमान: सूर्य उच्च का होने के कारण वे किसी के सामने मस्तक नहीं झुकाएंगे।
- दीर्घकालिक संघर्ष: शनि और राहु के प्रभाव के कारण उनका जीवन सुख-सुविधाओं से दूर संघर्षपूर्ण रहेगा।
- अमर कीर्ति: दशम भाव की प्रबलता के कारण उनकी ख्याति युगों-युगों तक सूर्य के समान चमकती रहेगी।
विशेष तथ्य: उनकी कुंडली में ‘रोहिणी’ नक्षत्र का प्रभाव था, जो उन्हें अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व और स्थिर बुद्धि प्रदान करता था।
- लोक मान्यताओं के अनुसार, ज्योतिषियों ने यह भी कहा था कि दिल्ली के तत्कालीन और भविष्य के शासकों के लिए यह बालक आजीवन ‘सिरदर्द’ बना रहेगा।
एक प्रसिद्ध दोहा इस संदर्भ में सटीक बैठता है:
“पग-पग भम्या पहाड़ में, खोया सब सुख चैन।
पण थारी आन न छोड़ी, धन-धन थारा नैण॥”
क्या ज्योतिषियों की भविष्यवाणी सच साबित हुई ?
हाँ, इतिहास में:
महाराणा प्रताप के बारे में ज्योतिष की सभी भविष्यवाणियाँ 100% सच साबित हुई।
इसलिए महाराणा प्रताप की वीरता के दोहे , कविता और इतिहास आज भी दृढ़ संकल्प के प्रणेता हैं।
- उन्होंने अकबर के सामने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया
- हल्दीघाटी जैसे युद्ध लड़े
- जंगलों में कठिन जीवन जिया
- स्वाभिमान और स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा
30 से अधिक महाराणा प्रताप की वीरता के दोहे |
हल्दीघाटी युद्ध और महाराणा प्रताप एक दूसरे के पर्याय हैं।
हल्दीघाटी युद्ध से महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा की पहचान है।
और महाराणा प्रताप के शौर्य गाथा से हल्दीघाटी को इतिहास में विशेष दर्जा मिला ।
महाराणा प्रताप हिन्दू स्वातंत्र्य और राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक बन गए तो हल्दीघाटी भारतीय शौर्य और राष्ट्रीय पराक्रम का प्रतिबिम्ब।
इसलिए हल्दीघाटी युद्ध को लेखक कर्नल टॉड ने भारत का थर्मोपेली कहकर स्वागत किया।
चौथी शताब्दी के महान सम्राट और शासक समुद्रगुप्त ने अपनी प्रतिष्ठा दिग्विजयी अभियान से प्राप्त की तो महाराणा प्रताप ने
अपनी प्रतिष्ठा अपने युग के प्रबलतम मुगलिया शासक अकबर के संधि प्रस्ताव को ठुकराकर अपनी स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने समस्त सुखों को न्यौछावर करके प्राप्त की।
सोर्स – गूगल बुक्स – हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप में डॉ मोहनलाल गुप्ता –
गीध कहे सुण गीधनी, सुण मकवाण सराह।
मन न हुवै हथ खावतां, राखण हिन्दू राह।।
अर्थात- युद्ध के पश्चात जब गिद्ध वीरों के शव खा रहे थे।
तब एक गिद्ध ने अपनी पत्नी से बोला कि हे गिद्धि , इस मान सिंह के हाथों को खाने का मन नहीं करता ,
ये वही हाथ हैं जिन्होंने हिंदुओं के रक्षक महाराणा की रक्षा की है।
सूर्यवंश में जन्म लियो, मेवाड़ राणा वीर।
कद काठी बलशाली अति, शौर्य अमित गंभीर।।
सूर्यवंश में जन्म लेनेवाला मेवाड़ के वीर राणा के कद काठी बलबान तथा उनका शौर्य असीम था ।
व्यक्तित्व तेज और ओज से परिपूर्ण जबकि स्वभाव अति गंभीर एवं दृढ़ था।
हल्दीघाटी सिंह सा, प्रताप भयो बलवान।
मातृभूमि की रक्षा में अर्पित तन- मन-प्राण ।।
वीरता के प्रतीक महाराणा प्रताप देशभक्ति और त्याग की भावना से लबरेज़ थे।
जिनका एकमात्र उद्देश्य मातृभूमि की रक्षा करना था।
मातृभूमि की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए वे हमेशा तन मन और प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहे।
इसलिए भारतीय इतिहास में प्रेरणा और राष्ट्रगौरव के प्रतीक के रूप में सबसे पहले इस वीरपुरुष को याद किया जाता है।
अकबर के प्रलोभन तले, झुका न प्रताप वीर ।
संकल्पों की ज्वाला में, जल गए शत्रु धीर।
महाराणा प्रताप अकबर के अनेकों प्रकार के प्रलोभन को ठुकराकर अपने आत्मसम्मान के आगे सिर नहीं झुकाया।
उनके भीतर जलने वाला संकल्पों की ज्वाला ने अकबर जैसे शत्रुओं के मनोबल को भस्म कर दिया।
इस दोहा का मैसेज है कि सच्चा वीर वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से संकोच और समझौता नहीं करता ।
मुट्ठी भर थी सैन्य बल, हृदय विशाल अपार।
मरते दम तक युद्ध रचा, रण था उनका द्वार।।
कम सैन्य बल के बावजूद महाराणा प्रताप का अदम्य दृढ़ संकल्प ,साहस और हृदय विशाल था।
जिसके दम पर अंतिम सांस तक युद्ध को अपना मार्ग बनाया और रणभूमि को अपना द्वार समझा।
तलवारों की धार बनी, न्याय की तेज लकीर।
कण कण में था युद्ध रस, बोले शौर्य शरीर।।
महाराणा प्रताप की तलवार युद्ध का शस्त्र नहीं बल्कि न्याय की लक्ष्मण रेखा थी ।
जो अन्याय और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए उठती थी।
उनके भीतर का शौर्य इतना शक्तिशाली था कि उनके शरीर की हर कोशिका और खून का हर कतरा युद्ध की भावना से लवरेज प्रतीत होता था।
उनके आचरण, वाणी और पराक्रम हमेशा वीरता की भाषा बोलते थे।
मेवाड़ की आन बने, राजपुताना मान।
स्वाभिमान की मूर्ति हुए, गौरव उनकी जान।।
महाराणा प्रताप केवल मेवाड़ के सम्राट नहीं थे बल्कि स्वाभिमान और दृढ़ संकल्प के साक्षात् मूर्ति थे।
जिनके कारण राजपुताना का मस्तक सदैव ऊंचा रहा।
चित्तौड़ के कंगूरे, आज कहें इतिहास।
प्रताप खड़े अब भी यहाँ, बन स्वाभिमान प्रकाश।।
चित्तौड़ के कंगूरे अर्थात् चित्तौड़गढ़ किले के ऊंची दीवारों के ऊपर बने कंगूरे (दांतेदार भाग)
जब राजपूताना की इतिहास के गौरवगाथा में महाराणा प्रताप के गौरवशाली अमर व्यक्तित्व को स्मरण करता है ।
भले आज वो नहीं हैं, पर उनका स्वाभाविक स्वाभिमान और आदर्श आज भी इस भूमि पर जीवित हैं।
चेतक अश्व महान था, स्वामी पर बलिहार।
प्राण दिए रणभूमि में, रच गया अमर इतिहास।।
यह दोहा महाराणा प्रताप के प्रिय और बलिदानी अश्व चेतक की अद्वितीय भक्ति और बलिदान को उजागर करता है।
रणभूमि में बिजली की रफ़्तार से भागने वाला
और स्वामी के मन के इशारों को भांपने वाला 26 फीट चौड़ी दर्रा को पार कर
अपने स्वामी की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए और इतिहास में अपने स्वामी के साथ वो भी अमर हो गया।
चेतक चढ़ राणा घूमते, करते मेवाड़ पहरे।
मृत्यु साथ ले घूमता, जैसे महाकाल ठहरे।।
ये दोहा में महाराणा प्रताप जब चेतक पर चढ़कर मेवाड़ घूमते थे तो ऐसा लगता था मानो यमराज भी इनको ठहर जाता है।
चेतक एक घोड़ा नहीं था, एक ऐसा प्रहरी था जो खतरा आने से पहले खतरा को भांप लेता था।
चेतक की चाल, सतर्कता और साहस से ऐसा लगता था मानो स्वयं मृत्यु को भी साथ लिए चलता हो परन्तु भय से नहीं बल्कि अपने स्वामी के वीरता के गर्व से।
प्राणों की बाजी लगाकर स्वामी की रखवाली की।
रण में कूद पड़ा चेतक, अमरकथा उजियाली की।
इस दोहे में चेतक के अपने स्वामी के प्रति साहस, समर्पण , त्याग,बलिदान की भावना को का कवि ने अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।
चेतक ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना रणभूमि में कूदकर मृत्यु का सामना करते हुए भी पीछे हटना स्वीकार नहीं किया
और अपने स्वामी महाराणा प्रताप की प्राणों की रक्षा की। इस तरह इतिहास में अपना नाम अमर स्थान प्राप्त कर लिया।
युग युग गूंजे नाम यह, भारत का अभिमान।
महाराणा प्रताप को, कोटि कोटि प्रणाम।।
यह दोहा महाराणा प्रताप के गौरवशाली अमर कीर्ति और स्वतंत्रता की भावना से ओत प्रोत राष्ट्रगौरव को व्यक्त करता है।
उनका नाम युगों युगों तक गूंजता रहे और उनके जीवन का संघर्ष, त्याग, वीरता, स्वाभिमान को आने वाली पीढ़ीयों को सदा प्रेरणा देता रहे।
इसलिए कवि उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम अर्पित करता है।
कहे पृथ्वीराज प्रिया, नैक उर धीर धरो,
चिरंजीवी राणा भी म्लेच्छनभगावैगो।
मन के मरद मानी प्रबल प्रताप सिंह,
बब्बर ज्यों तड़फि अकबर पै आवैगो।।
यह दोहा वीरता, धैर्य और आशा से भरा हुआ है। इसमें एक वीर नारी को संबोधित करते हुए भविष्य की विजय का विश्वास व्यक्त किया गया है।
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ:
“कहे पृथ्वीराज प्रिया, नैक उर धीर धरो,”
यहाँ पृथ्वीराज अपनी प्रिय (संभवतः पत्नी या किसी वीर नारी) से कहते हैं कि तुम अपने हृदय में धैर्य रखो, घबराओ मत।
“चिरंजीवी राणा भी म्लेच्छन भगावैगो।”
अर्थात राणा (वीर शासक) दीर्घायु होकर विदेशी आक्रमणकारियों (म्लेच्छों) को अवश्य भगा देगा।
“मन के मरद मानी प्रबल प्रताप सिंह,”
यहाँ प्रताप सिंह (महाके
राणा प्रताप) का वर्णन है कि वे मन के दृढ़, स्वाभिमानी और अत्यंत शक्तिशाली पुरुष हैं।
“बब्बर ज्यों तड़फि अकबर पै आवैगो।“
अर्थात वे शेर (बब्बर) की तरह तड़पकर अकबर पर टूट पड़ेंगे और उसका सामना करेंगे।
यह दोहा वीरता और आत्मविश्वास का संदेश देता है।
इसमें कहा गया है कि कठिन समय में धैर्य रखना चाहिए, क्योंकि वीर योद्धा (जैसे महाराणा प्रताप) शेर की तरह दुश्मनों पर आक्रमण करके विजय प्राप्त करेंगे।
धर्म रहसी, रहसी धरा, खिस जासे खुरसाना ।
अमर विसंभार अमर रखियो नधयो राणा।।
इस दोहे को लिखने का उद्देश्य था। धर्म रहेगा और धरती भी रहेगी, मगर मुगलों की बादशाहत एक दिन खत्म हो जाएगी।
अतः महाराणा प्रताप मेरा तुमसे यह कहना है कि प्रभु के सहारे अपने प्रण पर अडिग रहना।
इसी के साथ पृथ्वीराज ने महाराणा को लिखा – कदाचित सूरज पश्चिम से निकलने लगे, कदाचित अंधेरा हो जाए,
दुनिया में दिन के समय रात होने लगे,
यदि हमारे प्रिय प्रताप ने अकबर को अपने मुख से बादशाह कहकर पुकारा तो इससे अच्छा तो मैं यही समझता हूं कि मैं आपकी कुछ भी सेवा नहीं कर सका।
इससे प्रेरित होकर महाराणा प्रताप ने अकबर को लिखा कि “जब तक मेवाड़ में राजपूती आन कायम है तब तक प्रताप का सिर अकबर के सामने कभी नहीं झुकेगा।
जिस दिन राजपूतों की मर्यादा नष्ट हो जाएगी, वीरों का नामों निशान मिट जाएगा उस दिन प्रताप की लाश भी अकबर के दरबार में जाकर अधीनता नहीं स्वीकार करेगी।
अकबर ने अपने गुप्त संदेश लिखकर भेजा— शाबाश महाराणा प्रताप सिंह ।
हमें तुमसे यही उम्मीद थी। आप वास्तव में एक सच्चे राजपूत हो। हिंदुस्तान को आप जैसे बहादुर जांनिसारों पर गर्व होगा ।
महाराणा प्रताप की वीरता के दोहे
“माई एहड़ा पूत जण, जेड़ा राण प्रताप।
अकबर सूतो ओझकै, जाण सिराणै साँप॥”
(अर्थ: हे माता! प्रताप जैसा पुत्र पैदा कर, जिसे अकबर नींद में भी अपने सिरहाने साँप की तरह मानता है और खौफ खाता है
आफत सही अमाप, आजादी प्रण हित अड़्यो।
पातळ भूत प्रताप, रांघड़ राजस्थान रो॥”
“नामे शाहां शीश नह, अल्प न दीधो आंण।
चित्तौड़गढ़ न छोडियो, राणा प्रताप प्रमाण॥”
(अर्थ: शाह (अकबर) के सामने सिर नहीं झुकाया और न ही अधीनता स्वीकार की।)
चित्तौड़ की रक्षा के लिए अडिग रहने वाले राणा प्रताप ही सच्चे उदाहरण हैं
रणभूमि में गरजा प्रताप का नाम, झुका दिया मुगल का जाल।
अकबर का दम्भ निचोड़ दिया, वीर शिरोमणि प्रताप निहाल॥”
(अर्थ: युद्ध के मैदान में प्रताप की हुंकार से मुगल सेना थर्रा उठी और उन्होंने अकबर का अहंकार तोड़ दिया।)
1. नामे शाहां शीश नह, अड़ियां खड़ौ अबीह।
ऊभै भालै छांह तळ, राखी रजपूतीह॥ —- उम्मेद सिँह मान्यास
भावार्थ: महाराणा प्रताप ने बादशाहों के आगे कभी अपना सिर नहीं झुकाया और अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग (अबीह) खड़े रहे।
उन्होंने महलों की छाया के बजाय अपने ‘भाले की छाया’ के नीचे रहकर राजपूती गौरव की रक्षा की।
परिप्रेक्ष्य: यह प्रताप के उस कठिन समय को दर्शाता है जब उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर युद्ध के मैदान को ही अपना घर बना लिया था।
2. अकबर कीना याद. हिँदू नृप हाजर हुवा।
मेदपाट मरजाद, पग लगो न प्रतापसी॥ —- दुरसा आढ़ा
भावार्थ: अकबर ने जब भी याद किया (बुलाया), भारत के कई हिंदू राजा उसके दरबार में हाजिर हो गए।
लेकिन मेवाड़ (मेदपाट) की मर्यादा के प्रतीक प्रताप के पैर कभी अकबर के दरबार की ओर नहीं बढ़े।
परिप्रेक्ष्य: प्रसिद्ध कवि दुरसा आढ़ा, जो स्वयं अकबर के दरबारी थे, उन्होंने प्रताप की स्वतंत्रता प्रियता की प्रशंसा में यह कहा था।
3] देबारी सुरद्वार, अड़ियो अकबरियो असुर।
लड़ियो भड़ ललकार, पोलां खोल प्रतापसी॥ —- ऊमरदान लालस
भावार्थ: देबारी (उदयपुर का प्रवेश द्वार) के सिंहद्वार पर जब अकबर की ‘असुर’ सेना आकर अड़ गई, तब वीर प्रताप ने किवाड़ खोलकर और ललकार कर युद्ध किया।
परिप्रेक्ष्य: यह देबारी के युद्ध और प्रताप की आक्रामक रक्षात्मक रणनीति का वर्णन है।
4. धर बांकी दिन पाधरा, मरद न मूकै माण।
घणा नरिँदां घेरियो, रहै गिरिँदां राण॥ —- पृथ्वीराज राठौड़
भावार्थ: धरती विकट हो और समय प्रतिकूल (पाधरा/सीधा न होना) हो, तब भी असली मर्द अपना मान-सम्मान नहीं छोड़ता।
भले ही अनगिनत राजाओं ने अकबर का साथ देकर प्रताप को घेर लिया, लेकिन ‘पहाड़ों का राणा’ (गिरिँदां राण) अपनी टेक पर अटल रहा।
परिप्रेक्ष्य: बीकानेर के पृथ्वीराज राठौड़ ने प्रताप का मनोबल बढ़ाने के लिए यह संदेश भेजा था।
5. नृप करवा नजराण, शाह अगां झुकिया सबै।
भूप पतो हिँद भाण, झुकियो खग वाही जठै॥ —- नाथू सिँह महियारिया
भावार्थ: उपहार (नजराना) देने के लिए दुनिया भर के राजा बादशाह के आगे झुक गए।
लेकिन हिंदुओं के सूर्य (हिँद भाण) प्रताप केवल वहीं झुके जहाँ उन्हें तलवार चलानी (खग वाही) थी।
परिप्रेक्ष्य: यह प्रताप के उस चरित्र को बताता है कि उनका झुकना केवल रणभूमि में वार करने के लिए था, आत्मसमर्पण के लिए नहीं।
6. हाथी बंध घणां घणां हेमर बंध, कसूं हजारी गरब करो।
पातळ राण हंसे त्यां पुरखां, भाड़ै महलां पेट भरो॥ —- जाडा मेहडू
भावार्थ: जिन राजाओं के यहाँ हजारों हाथी और घोड़े बंधे हैं, वे व्यर्थ ही गर्व करते हैं।
राणा प्रताप उन लोगों पर हंसते हैं जो मुगलों की चाकरी करके उनके महलों में अपना पेट भर रहे हैं।
परिप्रेक्ष्य: यह मुगलों की गुलामी करने वाले सामंतों पर करारा कटाक्ष है।
7. बहोड़ देसे हणक बेसे, पापी पूरे पेटड़ा।
मेछांरी मिजलस मेवाड़ौ. हुवो न राण हजारी॥ —- खेतसी चारण
भावार्थ: कई लोग अपने देश को मुगलों को सौंपकर और उनकी महफिल (मिजलस) में बैठकर अपना पापी पेट भर रहे हैं।
लेकिन मेवाड़ का राणा कभी उन हजारों की भीड़ का हिस्सा नहीं बना।
परिप्रेक्ष्य: यह प्रताप की अद्वितीयता को रेखांकित करता है कि उन्होंने ‘भीड़’ का हिस्सा बनने के बजाय ‘अकेला’ लड़ना चुना।
8. गिरपुर देस गमाड़, भमिया पग पग भाखरां।
मह अंजसै मेवाड़, सह अंजसै सीसोदिया॥ —- म. मान सिँह मारवाड़
भावार्थ: अपने राज्य के लिए उन्होंने पहाड़ों और जंगलों (भाखरां) की खाक छानी और कष्ट सहे।
आज पूरी धरती मेवाड़ पर गर्व करती है और सारा संसार सिसोदिया वंश की जय-जयकार करता है।
परिप्रेक्ष्य: जोधपुर के महाराजा मान सिंह द्वारा प्रताप के बलिदान और उसके प्रति वैश्विक सम्मान का वर्णन।
9. यद्यपि है न प्रताप जग, तदपि प्रताप प्रताप।
आर्यन हर्ष अमापप्रद, यवनन को संताप॥ —- केसरी सिँह बारहठ
भावार्थ: भले ही आज प्रताप शरीर से इस जगत में नहीं हैं, लेकिन उनका ‘प्रताप’ (तेज/यश) आज भी जीवित है।
यह यश आर्यों (भारतीयों) को असीम हर्ष देता है और शत्रुओं (यवनों) के मन में आज भी भय और संताप पैदा करता है।
परिप्रेक्ष्य: यह आधुनिक काल के क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह बारहठ की श्रद्धांजलि है, जो प्रताप को राष्ट्रभक्ति का अमर प्रतीक मानते हैं।
10. राव हीँदवां तणो रोदां रिप, राणौ आपाणी कुळ रीत।
पड़िया रहै अवर नृप पावां, चढ़ियो कुंभ कळोधर चीत॥ —- पीरदान आशिया
भावार्थ: हिंदुओं के रक्षक प्रताप ने अपने कुल की रीति निभाई।
जहाँ अन्य राजा मुगलों के पैरों में पड़े रहे, वहीं राणा का चित्त हमेशा कुंभलगढ़ के ऊँचे शिखरों की तरह अडिग और स्वतंत्र रहा।
परिप्रेक्ष्य: यह प्रताप की मानसिक दृढ़ता और उनके दुर्ग (कुंभलगढ़) की अजेयता का संगम है।
11. चेटक पवंग न है चीतौड़ै, कनियान दियै गर थकि रोड़।
चकता नहं कूंभलगढ़ चढिया, अकबर सूं परताप अरोड़॥ —- केसरी सिँह रूपावास
भावार्थ: चेतक जैसा घोड़ा (पवंग) चित्तौड़ की धरा पर फिर नहीं हुआ, जिसने थकान को मात देकर अपने मस्तक को शत्रुओं के सामने कभी नहीं झुकाया।
‘चकता’ (मुगल वंश) कभी कुंभलगढ़ पर उस तरह विजय नहीं पा सका कि वह प्रताप के अजेय स्वाभिमान (अरोड़) को तोड़ सके।
परिप्रेक्ष्य: यह चेतक की वीरता और कुंभलगढ़ की अभेद्यता के माध्यम से प्रताप की अटूट प्रतिज्ञा का वर्णन करता है।
12. गयंद मान रे मुहर ऊभौ हुतौ दुरदगत, सिलहपोसां तणा जूथ साथै।
तद बही रूक अणचूक पातल तणी, मुगल बहलोलखां तणै माथै॥ —- गोरधन बोगसा
भावार्थ: जब मुगल सेनापति बहलोल खान अपने भारी कवच (सिलहपोसां) और लश्कर के साथ हाथी पर सवार होकर सामने आया,
तब प्रताप (पातल) की अचूक तलवार (रूक) उसके सिर पर ऐसी चली कि उसने बहलोल खान को घोड़े समेत दो फाड़ कर दिया।
परिप्रेक्ष्य: यह हल्दीघाटी के युद्ध की उस प्रसिद्ध घटना का चित्रण है जिसने मुगलों के मन में प्रताप का खौफ भर दिया था।
13. महलागै पाप जको अभनमो मोकल, पिड अदतार भेटतां पाप।
आज प्रतीत हुवौ आहाड़ा, पेखै मुख ताहरो प्रताप॥ —- माला सांदू
भावार्थ: जो लोग मुगलों की गुलामी को गौरव मानते थे, उनके लिए आज प्रताप का मुख देखना ही उनके पापों का प्रायश्चित करने जैसा है।
अहाड़ा (मेवाड़ का राजवंश) के कुलदीपक प्रताप के मुख पर वह तेज (प्रताप) है जो अधर्म को भस्म कर देता है।
परिप्रेक्ष्य: यह प्रताप को एक दैवीय अवतार और धर्मरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
14. इण कुळ री याही रीत, सब जाणत संसार।
जो दृढ़ राखै धरम को, तिहि राखै करतार॥ —- अब्दुल रहीम खानखाना
भावार्थ: मेवाड़ के इस कुल (सिसोदिया) की यही रीत है जिसे सारा संसार जानता है—
“जो अपने धर्म (कर्तव्य और स्वाभिमान) पर दृढ़ रहता है, ईश्वर (करतार) स्वयं उसकी रक्षा करता है।”
परिप्रेक्ष्य: मेवाड़ के राज्य-चिह्न पर अंकित इस सूत्र को अकबर के नवरत्न रहीम ने प्रताप की अटूट धर्म-निष्ठा को देखकर दोहराया था।
15. दिल्ली तखत तुलावणै, कर तुरकां तुलियाह।
नमिया जै नमिया नहीं, अणनमिया नमियाह॥ —- बावजी चतुर सिँह जी
भावार्थ: दिल्ली के तख्ते के सामने (अकबर के सामने) कई राजा झुक गए (झुक गए)।
जो झुक गए वे इतिहास में मिट गए, लेकिन जो ‘अणनमिया’ (नहीं झुके) रहे, आज पूरी दुनिया उन्हीं के चरणों में झुकती है।
परिप्रेक्ष्य: यह स्वाभिमान की महत्ता बताता है कि झुकने वाले राजा गुमनाम हो गए, पर न झुकने वाले प्रताप अमर हो गए।
16. पातल पणधारी घणो, जलम्यो इणहिज ठौड़।
अनमी बण रहियो अडर, गढ़ थारै चीतौड़॥ —- उम्मेद सिँह धौली
भावार्थ: हे चित्तौड़ के गढ़! तेरी इस पावन भूमि पर प्रताप जैसा महान प्रतिज्ञापालक (पणधारी) पैदा हुआ,
जो आजीवन ‘अनमी’ (न झुकने वाला) और निडर बनकर खड़ा रहा।
परिप्रेक्ष्य: यह चित्तौड़गढ़ के गौरव को उसके वीर पुत्र प्रताप से जोड़कर देखता है।
17. द्रव्य देश विधि वश तजे, तदपि विषाद न लेश।
धरि धीर राख्यो धरम, नमियो न प्रताप नरेश॥ —- राम सिँह केलवा
भावार्थ: समय (विधि) के फेर से धन, दौलत और देश (राज्य) छूट गया, लेकिन प्रताप के मन में रत्ती भर भी दुख (विषाद) नहीं था।
उन्होंने धैर्य धारण कर अपने धर्म की रक्षा की और कभी सिर नहीं झुकाया।
परिप्रेक्ष्य: यह प्रताप के वैराग्य और कठिन परिस्थितियों में उनकी मानसिक शांति का वर्णन है।
18. हुं रजपूतण रो जायो हूं, रजपूती करज चुकाऊंला।
ओ सीस पड़ै पण पाघ नहीँ, दिल्ली रो मान झुकाऊंला॥ —- कन्हैया लाल सेठिया
भावार्थ: मैं एक वीरांगना का पुत्र हूँ और अपनी मातृभूमि का ऋण चुकाऊंगा।
भले ही मेरा सिर धड़ से अलग हो जाए, लेकिन मेरी पगड़ी (मान) नहीं गिरेगी;
मैं दिल्ली (मुगल सत्ता) के अहंकार को झुकाकर रहूँगा।
परिप्रेक्ष्य: आधुनिक काल के महान कवि सेठिया जी ने ‘पाथल और पीथल’ के माध्यम से प्रताप के संकल्प को जन-जन तक पहुँचाया।
19.जीता जी तो पातळ, राखी मूंछा री मरोड़।
नर नी निपज्यो फेर वस्यो, जो करतो वां री होड़॥ —- चावण्ड सिँह कारोही
भावार्थ: प्रताप ने जब तक जीवित रहे, अपने स्वाभिमान (मूंछों की मरोड़) को कायम रखा।
उनके जाने के बाद इस धरती पर कोई ऐसा वीर पैदा नहीं हुआ जो उनकी बराबरी (होड़) कर सके।
परिप्रेक्ष्य: यह प्रताप की अद्वितीयता को दर्शाता है कि वे अपने समय के अकेले महानायक थे।
20.आफत सही अमाप, आजादी प्रण हित अड़्यो।
पातळ भूत प्रताप, रांघड़ राजस्थान रो॥ —- हिम्मत सिँह ऊजळ
भावार्थ: आजादी के संकल्प के लिए प्रताप ने अनगिनत मुसीबतें सहीं और अडिग रहे।
राजस्थान का यह वीर (रांघड़) इतिहास का ऐसा जाज्वल्यमान ‘प्रताप’ है जो सदियों तक प्रेरणा देता रहेगा।
परिप्रेक्ष्य: यह राजस्थान की मिट्टी और स्वाधीनता के प्रति प्रताप के समर्पण की वंदना है।
21. खत्रियाण माण महिउद्धरण, एक क्षत्रि आलम कहे।
गायत्री मंत्र गहलौत गुरू, तिहि प्रताप शरण रहे॥ —- गंग राव
भावार्थ: कवि गंग कहते हैं कि सारा संसार प्रताप को क्षत्रिय धर्म का रक्षक और धरती का उद्धारक मानता है।
जैसे गायत्री मंत्र सभी मंत्रों में सर्वोपरि है, वैसे ही गहलोत (सिसोदिया) वंश के गुरु स्वरूप प्रताप की शरण में रहकर ही धर्म और मर्यादा सुरक्षित रही।
परिप्रेक्ष्य: मुगल दरबार के प्रसिद्ध कवि गंग द्वारा प्रताप को क्षत्रिय धर्म के मानक के रूप में प्रतिष्ठित करना।
22. तजिया घर आंगणा, गढ़ गवाड़ा गौर।
पातल भटक्यां डूंगरा, खोहा बीचली ठौर॥ —- पुष्पेन्द्र सिँह राव
भावार्थ: प्रताप (पातल) ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए महलों के सुख, घर-आँगन और सुरक्षित किलों का त्याग कर दिया।
उन्होंने जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम गुफाओं (खोहा) को अपना ठिकाना बनाना स्वीकार किया, पर परतंत्रता नहीं।
परिप्रेक्ष्य: प्रताप के ‘वनवास’ और पहाड़ों में रहकर छापामार युद्ध नीति अपनाने का वर्णन।
23. किलम लाख केकांण गज खंभ छेड़ै कुमख,
वावरे पंख बल दाख वलियौ।
आभ खूंमांण चौ माग औहाड़ता
गुरड़ अकबर तणो गरब गलियौ॥ —- रामा सांदू
भावार्थ: जिस प्रकार गरुड़ के झपट्टे से बड़े-बड़े नाग भी कांप जाते हैं,
उसी प्रकार जब आकाश (आभ) के नीचे मेवाड़ के सूर्य (खूंमांण) प्रताप ने अपनी शक्ति दिखाई,
तो अकबर का घमंड (गरब) गलकर पानी-पानी हो गया।
परिप्रेक्ष्य: यह अकबर की सैन्य शक्ति पर प्रताप के नैतिक और वीरतापूर्ण प्रहार का चित्रण है।
24. कलहणि करि थाट कलल ऊकलतै,
सोहड़ सिखरि पांव सजिसार।
औ बड़ि राण प्रताप ऊपरां,
खमियौ खांडा धार खंगार॥ —- बाघ सिँह राव
भावार्थ: जैसे पर्वत अडिग रहता है, वैसे ही महाराणा प्रताप ने अपने ऊपर शत्रुओं की अनगिनत तलवारों (खांडा) के प्रहारों को सहा,
लेकिन अपनी मर्यादा से पीछे नहीं हटे। उनका धैर्य तलवार की धार से भी अधिक तीक्ष्ण था।
परिप्रेक्ष्य: युद्ध में प्रताप के शरीर पर आए अनगिनत घावों और उनके अदम्य साहस को समर्पित।
25. असमान धार मंजर उचि ता पति,
आगर अलिम मलैनिल आप।
पालग मीन मोर तर पात्रां,
पयनिधि पावस वसंत प्रताप॥ —- ठाकुरदान बारहठ
भावार्थ: प्रताप का व्यक्तित्व बहुआयामी है—वे शत्रुओं के लिए समुद्र की तरह अथाह, मित्रों के लिए वर्षा (पावस) की तरह जीवनदायी और अपनी प्रजा के लिए वसंत की तरह सुखद हैं।
परिप्रेक्ष्य: प्रताप के चरित्र की कोमलता और कठोरता के संतुलन का काव्यात्मक वर्णन।
26. निगम निवांण तणाह, नागद्रहा नरहा जहीँ।
रावत वट राणांह, पिँड अण सुर परतापसी॥ —- सूरायच टापरिया
वार्थ: महाराणा प्रताप का शरीर पंचतत्वों का होते हुए भी देवताओं (अण सुर) के समान अलौकिक था।
उन्होंने अपनी वीरता से राणाओं की आन-बान और शान को अमर कर दिया।
परिप्रेक्ष्य: प्रताप को केवल एक राजा नहीं, बल्कि एक दिव्य विभूति के रूप में देखना।
27. रण जीतो परताप. तेज आमाप असम्मर।
मान समर मूकियौ,सुंणै सोई साह अकब्बर॥ —- किशोरदास
भावार्थ: प्रताप ने रणभूमि में अपनी तलवार के तेज से जीत हासिल की।
जब बादशाह अकबर ने सुना कि मान सिंह (आमेर नरेश) भी प्रताप के तेज के आगे निरुत्तर हो गए,
तो वह भी प्रताप की शक्ति को स्वीकार करने पर विवश हो गया।
परिप्रेक्ष्य: हल्दीघाटी के बाद प्रताप के बढ़ते प्रभाव और मुगल खेमे में उनकी चर्चा का वर्णन।
27. रांणी नीजां रांम, आहें ले अकबर तणा।
चोखै चीतोड़ाह, पाणै तूझ प्रतापसी॥ —- दलपति विजय जैन
भावार्थ: हे प्रताप! तेरे पराक्रम के कारण अकबर की रानियाँ भी रात भर आहें भरती हैं (भयभीत रहती हैं)।
चित्तौड़गढ़ की पवित्रता और मेवाड़ की रक्षा केवल तेरे ‘पाण’ (भुजाओं के बल) से ही संभव हुई।
परिप्रेक्ष्य: ‘खुमाण रासो’ के रचयिता द्वारा प्रताप की भुजाओं की शक्ति की सराहना।
28.पाधर जुड़े प्रतापसी, पोरस तणै प्रमाण।
राण विलूधो वीर रस, खग वाहे खुंमाण॥ —- गिरधर आशिया
भावार्थ: प्रताप जब युद्ध के मैदान (पाधर) में उतरते हैं, तो उनका पराक्रम राजा पोरस के समान जान पड़ता है।
वीर रस में डूबे हुए प्रताप जब अपनी तलवार (खग) चलाते हैं, तो शत्रु दल का विनाश तय है।
परिप्रेक्ष्य: ऐतिहासिक योद्धा पोरस से प्रताप की तुलना कर उनकी वीरता के स्तर को बताना।
29. अकबर सामे थूं कदी, झुकायो नहीं शीश।
पण थारे चरणा झुकै, जणा जणा रो शीश॥ —- म. शिवदान सिँह कारोही
भावार्थ: आपने अकबर के सामने कभी अपना सिर नहीं झुकाया, और आपकी इसी स्वाभिमानी अडिगता के कारण आज दुनिया के हर व्यक्ति का सिर आपके चरणों में सम्मान से झुक जाता है।
परिप्रेक्ष्य: प्रताप की ‘अणनम्यता’ (न झुकने के गुण) को वैश्विक सम्मान का आधार बताना।
30. खाग नमी ऊपर खळां, पाघ अनम्मी आप।
रही टेक हिँदवाण री, पलटे तुरंग प्रताप॥ —- कायमदान दधिवाड़िया
भावार्थ: आपकी तलवार (खाग) तो दुष्टों (खळां) पर वार करने के लिए नीचे झुकी, लेकिन आपकी पगड़ी (पाघ) हमेशा ऊँची रही।
जब प्रताप अपने घोड़े पर सवार होकर निकलते थे, तो मानो हिंदुओं की लाज और मर्यादा स्वयं उनके साथ चलती थी।
परिप्रेक्ष्य: स्वाभिमान और वीरता के अद्भुत संयोग का वर्णन।
31. महाराना उदेस को, सुत प्रताप सुभवंत।
कल्लु पत्ता को कुंवर, दोनुही मोद दिपंत॥ —- गिरिवर सिँह राव
भावार्थ: महाराणा उदयसिंह के पुत्र प्रताप अत्यंत सौभाग्यशाली और तेजस्वी हैं।
वे और पत्ता (फत्ता सिसोदिया) जैसे वीर कुंवर मेवाड़ के इतिहास के वे प्रकाश स्तंभ हैं जो सदैव चमकते रहेंगे।
परिप्रेक्ष्य: प्रताप और उनके पूर्ववर्ती बलिदानियों (जैसे पत्ता जी) के गौरवमयी उत्तराधिकार का स्मरण।
32. माई ऐडा पूत जण जैडा राणा प्रताप
अकबर सोतो उज के जाण सिराणे साँप”
भावार्थ: हे माता! यदि पुत्र को जन्म देना हो, तो राणा प्रताप जैसा शूरवीर पुत्र जनना।
प्रताप का खौफ ऐसा था कि अकबर सोते समय भी अचानक चौंक कर जाग जाता था,
उसे ऐसा महसूस होता था मानो उसके सिरहाने (तकिए के पास) साक्षात साँप बैठा हो।
परिप्रेक्ष्य: यह दोहा प्रताप के उस ‘मनोवैज्ञानिक प्रभाव’ को दर्शाता है जो उन्होंने मुगल साम्राज्य पर बना रखा था।
हल्दीघाटी और उसके बाद के छापामार युद्धों ने अकबर को मानसिक रूप से इतना विचलित कर दिया था
कि वह प्रताप को अपना सबसे बड़ा और अपराजेय शत्रु मानता था।
महाराणा प्रताप की वीरता पर कविता
चेतक पर चढ़ जिसने, भाला से दुश्मन संघारे थे…
मातृ भूमि के खातिर, जंगल में कई साल गुजारे थे…
झुके नहीं वह मुगलों से, अनुबंधों को ठुकरा डाला…
मातृ भूमि की भक्ति का, नया प्रतिमान बना डाला…
हल्दीघाटी के युद्ध में, दुश्मन में कोहराम मचाया था…
देख वीरता राजपूताने की, दुश्मन भी थर्राया था…
बलिदान पर राणा के, भारत माँ ने, लाल देश का खोया था…
वीर पुरुष के देहावसान पर, अकबर भी फफक कर रोया था…
भारत माँ का वीर सपूत, हर हिदुस्तानी को प्यारा हे…
कुँअर प्रताप जी के चरणों में, सत सत नमन हमारा हे…
वीर की सवारी कहलाया, चेतक बड़ा निराला था।
महाराणा के घोड़े से, हवा का पड़ गया पाला था।।
जंगल को अपना घर बनाया, घास की रोटी खाया।
हार नहीं मानी कभी, मेवाड़ को मुगलों से बचाया।।
मंज़ूर घास की रोटी है, घर चाहे नदी पहाड़ रहे।
अंतिम साँस तक चाहूँगा, स्वाधीन मेरा मेवाड़ रहे।।
माई ऐडा पूत जण जैडा महाराणा प्रताप।
अकबर सोतो उज के जाणे सिराणे साँप।।
राणा सांगा का वो वंशज, रखता था राजपूती शान।
कर आज़ादी का उद्घोष, भारत का वो था अभिमान।।
मुगल काल में पैदा हुआ वो बालक कहलाया राणा
होते जौहर चित्तौड़ दुर्ग फिर बरसा मेघ बन के राणा।
हरमों में जाती थीं ललना बना कृष्ण द्रौपदी का राणा
रौंदी भूमि ज्यों कंस मुग़ल बना कंस को अरिसूदन राणा।
छोड़ा था साथियों ने भी साथ चल पड़ा युद्ध इकला राणा
चेतक का पग हाथी मस्तक ज्यों नभ से कूद पड़ा राणा।
मानसिंह भयभीत हुआ जब भाला फैंक दिया राणा
देखी शक्ति तप वीर व्रती हाथी भी कांप गया राणा।
चहुँ ओर रहे रिपु घेर देख सोचा बलिदान करूँ राणा
शत्रु को मृगों का झुण्ड जान सिंहों सा टूट पड़ा राणा।
देखा झाला यह दृश्य कहा अब सूर्यास्त होने को है
सब ओर अँधेरा बरस रहा लो डूबा आर्य भानु राणा।
गरजा झाला के भी होते रिपु कैसे छुएगा तन राणा
ले लिया छत्र अपने सिर पर अविलम्ब निकल जाओ राणा।
हुंकार भरी शत्रु को यह मैं हूँ राणा मैं हूँ राणा
नृप भेज सुरक्षित बाहर खुद बलि दे दी कह जय हो राणा
कह नमस्कार भारत भूमि रक्षित करना रक्षक राणा!
चेतक था दौड़ रहा सरपट जंगल में लिए हुए राणा
आ रहा शत्रुदल पीछे ही नहीं छुए शत्रु स्वामी राणा।
आगे आकर एक नाले पर हो गया पार लेकर राणा
रह गए शत्रु हाथों मलते चेतक बलवान बली राणा।
ले पार गया पर अब हारा चेतक गिर पड़ा लिए राणा
थे अश्रु भरे नयनों में जब देखा चेतक प्यारा राणा।
अश्रु लिए आँखों में सिर रख दिया अश्व गोदी राणा
स्वामी रोते मेरे चेतक! चेतक कहता मेरे राणा!
हो गया विदा स्वामी से अब इकला छोड़ गया राणा
परताप कहे बिन चेतक अब राणा है नहीं रहा राणा।
सुन चेतक मेरे साथी सुन जब तक ये नाम रहे राणा
मेरा परिचय अब तू होगा कि वो है चेतक का राणा!
अब वन में भटकता राजा है पत्थर पे सोता है राणा
दो टिक्कड़ सूखे खिला रहा बच्चों को पत्नी को राणा।
थे अकलमंद आते कहते अकबर से संधि करो राणा
है यही तरीका नहीं तो फिर वन वन भटको भूखे राणा।
हर बार यही उत्तर होता झाला का ऋण ऊपर राणा
प्राणों से प्यारे चेतक का अपमान करे कैसे राणा।
एक दिन बच्चे की रोटी पर झपटा बिलाव देखा राणा
हृदय पर ज्यों बिजली टूटी, अंदर से टूट गया राणा।
ले कागज़ लिख बैठा, अकबर! संधि स्वीकार करे राणा
भेजा है दूत अकबर के द्वार ज्यों पिंजरे में नाहर राणा।
देखा अकबर वह संधि पत्र वह बोला आज झुका राणा
रह रह के दंग उन्मत्त हुआ कह आज झुका है नभ राणा।
विश्व विजय तो आज हुई बोलो कब आएगा राणा
कब मेरे चरणों को झुकने कब झुक कर आएगा राणा।
पर इतने में ही बोल उठा पृथ्वी यह लेख नहीं राणा
अकबर बोला लिख कर पूछो लगता है यह लिखा राणा।
पृथ्वी ने लिखा राणा को क्या बात है क्यों पिघला राणा?
पश्चिम से सूरज क्यों निकला सरका कैसे पर्वत राणा?
चातक ने कैसे पिया नदी का पानी बता बता राणा?
मेवाड़ भूमि का पूत आज क्यों रण से डरा डरा राणा?
भारत भूमि का सिंह बंधेगा अकबर के पिंजरे राणा?
दुर्योधन बाँधे कृष्ण तो क्या होगी कृष्णा रक्षित राणा?
अब कौन बचायेगा सतीत्व अबला का बता बता राणा?
अब कौन बचाए पद्मिनियाँ जौहर से तेरे बिन राणा?
यह पत्र मिला राणा को जब धिक्कार मुझे धिक्कार मुझे
कहकर ऐसा वह बैठ गया अब पश्चाताप हुआ राणा।
चेतक झाला को याद किया फिर फूट फूट रोया राणा
बोला, इस पापकर्म पर तुम अब क्षमा करो, अपना राणा।
और लिख भेजा पृथ्वी को कि नहीं पिघल सके ऐसा राणा
सूरज निकलेगा पूरब से, नहीं सरक सके पर्वत राणा।
चातक है प्रतीक्षारत कि कब होगी वर्षा पहली राणा
भारत भूमि का पुत्र हूँ फिर रण से डरने का प्रश्न कहाँ?
भारत भूमि का सिंह नहीं अकबर के पिंजरे में राणा
दुर्योधन बाँध सके कृष्ण ऐसा कोई कृष्ण नहीं राणा।
जब तक जीवन है इस तन में तब तक कृष्णा रक्षित राणा
अब और नहीं होने देगा जौहर पद्मिनियों का राणा!
महाराणा प्रताप शौर्य कविता (Poem on Maharana Pratap)
अकबर की इस बात से हर कोई हैरान था,
प्रताप को झुकाने के लिए आधा हिंदुस्तान देने को तैयार था.
पर मेवाड़ी सरदार को अपनी स्वतन्त्रता से प्यार था,
इसलिए उसके लालच भरे शर्त से इंकार था।
हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप का तलवार देख
शत्रु भाग रहा था,राणा के एक हुंकार से
पूरा अरि दल काँप रहा था.
अकबर के सेनापति भी प्रताप के सम्मुख आने से डरते थे,
क्योंकि सारे मुगल उनको काल देवता कहते थे।
जीवन पर्यन्त प्रताप दुश्मन से लड़ते रहें,
स्वतन्त्रता के खातिर हर दुःख सहते रहें।
जंगल को अपना घर बनाया,
घास की रोटी खाया,अपने साहस को बढ़ाया
फिर मातृभूमि को मुगलों से स्वतंत्र कराया।
प्रताप के वीरता का पूरे हिन्दुस्तान में चर्चा होने लगा,
ख़ुशी से हर कोई झूमने लगा महल दीपों से सजने लगा
अकबर को फिर ये समझ में आया
प्रताप को उसने कभी न हरा पाया
फिर इस धरा को छोड़ वो मेवाड़ी वीर स्वर्ग चला
स्वर्ग दूत भी राणा को गौर से देखने लगा।
जब अकबर ने राणा के मौत की सूचना पाई,
उसके चेहरे पर एक उदासी छाई
राणा को हराने की अकबर की ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो पाई।
-वेदप्रकाश ‘वेदान्त’
क्षत्रिय वंश के गौरव महास्वाभिमानी महाराणा
प्रताप के शौर्य का वर्णन कवि श्यामनारायण पांडेय ने अपनी कविता ‘हल्दी घाटी का युद्ध’ में बेहद ओजस्वी शब्दों के साथ किया है।
इस कविता में राणा प्रताप के जीवन संघर्षों को पेश किया गया है।
कवि बताते हैं कि राणा प्रताप किस-किस तरह के कष्टों को सहते हुए सिंहासन, सत्ता और स्वाभिमान की रक्षा की…
यह एकलिंग का आसन है
इस पर न किसी का शासन है
नित सिहक रहा कमलासन है
यह सिंहासन सिंहासन है
यह सम्मानित अधिराजों से
अर्चित है¸ राज–समाजों से
इसके पद–रज पोंछे जाते
भूपों के सिर के ताजों से
इसकी रक्षा के लिए हुई
कुबार्नी पर कुबार्नी है
राणा! तू इसकी रक्षा कर
यह सिंहासन अभिमानी है
यह सिंहासन अभिमानी है…
सुनता हूं उस मरदाने की
दिल्ली की अजब कहानी है
राणा! तू इसकी रक्षा कर
यह सिंहासन अभिमानी है
तुझमें चूड़ा सा त्याग भरा
बापा–कुल का अनुराग भरा
राणा प्रताप के रग–रग में
जननी–सेवा का राग भरा
अगणित–उर–शोणित से सिंचित
इस सिंहासन का स्वामी है
भूपालों का भूपाल अभय
राणा–पथ का तू गामी है
दुनिया कुछ कहती है सुन ले
यह दुनिया तो दीवानी है
राणा! तू इसकी रक्षा कर
यह सिंहासन अभिमानी है
निष्कर्ष: केवल इतिहास नहीं, अमर प्रेरणा हैं महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप का जीवन केवल युद्धों, संधियों और तारीखों का संकलन नहीं है,
बल्कि यह उस अदम्य मानवीय इच्छाशक्ति का दस्तावेज़ है जो किसी भी बड़ी सत्ता के सामने झुकना नहीं जानती।
आज के युग में, जब लोग छोटी-छोटी परेशानियों में अपने सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं,
तब प्रताप की ‘घास की रोटी’ और ‘अरावली की गुफाओं’ का संघर्ष हमें सिखाता है कि स्वाभिमान का मूल्य किसी भी राजसी सुख से कहीं अधिक ऊँचा होता है।
ज्योतिषियों की वे भविष्यवाणियाँ अक्षरशः सत्य साबित हुईं, क्योंकि प्रताप ने न केवल मुगलों को चुनौती दी,
बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ‘स्वतंत्रता’ शब्द को परिभाषित भी किया।
हल्दीघाटी की मिट्टी आज भी उनके शौर्य की गवाही देती है और चेतक का बलिदान स्वामीभक्ति की पराकाष्ठा है।
महाराणा प्रताप की वीरता के दोहे और कविताएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं;
ये शब्द उस मशाल की तरह हैं जो हमारे भीतर सोए हुए साहस को जगाते हैं।
यदि हम उनके जीवन से केवल ‘दृढ़ संकल्प’ और ‘मातृभूमि के प्रति प्रेम’ को ही आत्मसात कर लें, तो यह उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
महाराणा प्रताप इतिहास के पन्नों में दफन कोई नाम नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के हृदय में धड़कने वाला विश्वास है,
जो न्याय और सम्मान के लिए लड़ना जानता है। मेवाड़ के इस सूर्य की चमक युगों-युगों तक भारत के गौरवशाली मस्तक पर तिलक की भांति चमकती रहेगी।
“नमन है उस वीर को, जिसने कभी हार नहीं मानी, अमर हो गई जग में, जिसकी गौरवशाली कहानी।”
महाराणा प्रताप का जन्म कब हुआ था ?
महाराणा प्रताप का जन्म तिथि: 9 मई 1540 ईस्वी
वे महाराणा उदय सिंह द्वितीय और माता जयवंता बाई के पुत्र थे।
महाराणा प्रताप का जन्म कहाँ और कैसे हुआ था ?
स्थान: कुंभलगढ़ किला (राजस्थान)
महाराणा प्रताप का जन्म एक ऐसे कालखंड में हुआ था जब मेवाड़ पर संकट और अस्थिरता का दौर था ।
चित्तौड़ संकट के दौर से गुजर रहा था।
चहुँ ओर से शत्रुओं का खतरा बना हुआ था ।
उनके पिता उदयसिंह ने अपनी सत्ता को सुरक्षित करने के लिए कुंभलगढ़ को अपना केंद्र बनाया था।
इसलिए उनका जन्म राजमहल की बजाय किले (कुंभलगढ़) में हुआ
जयवंता बाई स्वयं एक अत्यंत धार्मिक और स्वाभिमानी महिला थीं, जिनका प्रभाव प्रताप के संस्कारों पर बचपन से ही पड़ा।
लोक कथाओं के अनुसार, उनके जन्म के समय पूरे मेवाड़ में हर्षोल्लास छा गया था ।
क्योंकि राज्य को एक सशक्त उत्तराधिकारी की प्रतीक्षा थी।
महाराणा प्रताप के बारे में ज्योतिषियों की भविष्यवाणी क्या थी ?
महाराणा प्रताप का जन्म और उनसे जुड़ी ज्योतिषीय भविष्यवाणियाँ भारतीय इतिहास और लोकश्रुतियों का एक अत्यंत रोचक अध्याय हैं।
अखंड स्वाभिमान: सूर्य उच्च का होने के कारण वे किसी के सामने मस्तक नहीं झुकाएंगे।
दीर्घकालिक संघर्ष: शनि और राहु के प्रभाव के कारण उनका जीवन सुख-सुविधाओं से दूर संघर्षपूर्ण रहेगा।
अमर कीर्ति: दशम भाव की प्रबलता के कारण उनकी ख्याति युगों-युगों तक सूर्य के समान चमकती रहेगी।
क्या ज्योतिषियों की भविष्यवाणी सच साबित हुई ?
हाँ, इतिहास में:
उन्होंने अकबर के सामने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया
हल्दीघाटी जैसे युद्ध लड़े
जंगलों में कठिन जीवन जिया
स्वाभिमान और स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा