कबीर के 200 दोहे अर्थ सहित? का संग्रह जो आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। सरल हिंदी अर्थ के साथ हर मुश्किल का हल अपनी समस्याओं का समाधान पाएं
कबीर के 200 प्रेरणादायक दोहे अर्थ सहित पढ़िए। ये दोहे अहंकार, माया और अज्ञान से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
कबीर के 200 दोहे अर्थ सहित pdf
कबीर के दोहे pdf
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1.“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
अर्थ: कबीर कहते हैं कि मैं सारा जीवन दूसरों में बुराइयाँ खोजता रहा, लेकिन मुझे कोई बुरा नहीं मिला। पर जब मैंने गहराई से अपने मन के भीतर झाँका, तो पाया कि मुझसे बुरा (मुझसे अधिक कमियों वाला) कोई और है ही नहीं।
आज हम अक्सर दूसरों को जज (Judge) करते हैं और अपनी कमियों को नजरअंदाज कर देते हैं। यह दोहा हमें सिखाता है कि सुधार की शुरुआत स्वयं (Self-Improvement) से होनी चाहिए। जब हम स्वयं का स्वमूल्यांकन करेंगे और अपनी कमियां दूर करेंगे, तो दुनिया अपने आप बेहतर लगने लगेगी।
2. “काल करे सो आज कर, आज करे सो अब,
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब।”
भावार्थ: टालमटोल जीवन की सबसे बड़ी चोरी है। समय निकल जाता है, अवसर नहीं लौटते। जो काम कल करना है, उसे आज करो; जो आज करना है, उसे अभी करो। जीवन क्षणभंगुर है, पता नहीं अगला पल मिले या नहीं।
3. “माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।”
अर्थ: हाथ में माला घुमाते हुए युग बीत गए, पर मन की चंचलता और विचार नहीं बदले। कबीर कहते हैं कि हाथ की माला (लकड़ी के दाने) फेरना छोड़ दो और अपने मन के मोतियों को बदलो, यानी अपने विचारों को शुद्ध करो।
4. “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”
अर्थ:
किताबें पढ़ते-पढ़ते लोग मर गए, पर सच्चा ज्ञानी नहीं बने। जिसने प्रेम के ढाई अक्षर समझ लिए, वही पंडित है। ज्ञान का मूल्य तभी है जब उसमें करुणा और प्रेम हो।
5. “साईं इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय,
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए।।”
अर्थ:
हे प्रभु! मुझे उतना ही दो, जितना मेरे परिवार के लिए पर्याप्त हो। न मैं भूखा रहूँ, न कोई अतिथि/साधु भूखा जाए।
भावार्थ:
कबीर लोभ नहीं, संतोष और सामाजिक जिम्मेदारी की प्रार्थना करते हैं।
6. “कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ।
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ ।।”
- कबीर कहते हैं कि यह शरीर एक पक्षी के समान हो गया है। जैसे पक्षी आकाश में कहीं भी उड़ने के लिए स्वतंत्र है, वैसे ही यह शरीर भी वहीं खिंचा चला जाता है जहाँ मन उसे ले जाना चाहता है। यदि मन में अच्छे विचार हैं, तो शरीर अच्छे कार्यों की ओर जाएगा; और यदि मन में विकार हैं, मन के विचार ही शरीर की दिशा तय करते हैं। संगति केवल लोगों की ही नहीं, बल्कि विचारों और आदतों की भी होती है। अच्छी संगत व्यक्ति को ऊंचाइयों पर ले जाती है, जबकि बुरी संगत उसे नष्ट कर देती है।
7. “यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥”
- कबीर कहते हैं कि यह शरीर (और इसमें रचे-बसे विकार जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह) विष की एक बेल के समान है। यदि हम केवल शारीरिक और इंद्रिय सुखों में डूबे रहें, तो यह विष हमारे आध्यात्मिक और मानसिक जीवन को नष्ट कर देता है।
- कबीर कहते हैं कि यदि अपना सिर (अहंकार) न्योछावर करने के बदले में भी एक सच्चा गुरु मिल जाए, तो इस सौदे को भी बहुत सस्ता समझना चाहिए। यहाँ ‘शीश देने’ का अर्थ भौतिक गर्दन काटना नहीं, बल्कि अपने ‘अहंकार’ (Ego) का पूर्ण त्याग करना है।
8. “दया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय।
साईं के सब जीव हैं, किरी कुंजर दोय॥”
अर्थ: कबीर पूछते हैं कि हम किस पर दया करें और किसके प्रति निर्दयी हों? इस संसार के सभी जीव—चाहे वह छोटी सी चींटी (किरी) हो या
विशाल हाथी (कुंजर)—सब उस एक ही परमात्मा (साईं) की संतानें हैं। जब सबमें एक ही चेतना है, तो भेदभाव कैसा? मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।
9. “धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आय फल होय॥”
अर्थ: हे मन! धीरज रख, सब कुछ अपने समय पर धीरे-धीरे ही होता है। जिस प्रकार माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से भी सींच दे, तब भी उसमें फल तभी लगेंगे जब उसकी सही ऋतु (मौसम) आएगी। समय से पहले कुछ भी प्राप्त नहीं होता। यह सिखाता है कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती; मेहनत करते रहिए, सही समय आने पर परिणाम अवश्य मिलेगा।
10. “मन चलतां तन भी चलै ,ताते मन को घेर ।
तन मन दोऊ बसि करै, राइ होय सूमेर ।।”
अर्थ: कबीर कहते हैं कि जैसा हमारा मन चलता है, हमारा शरीर (इंद्रियाँ) भी उसी का अनुसरण करने लगता है। मन ही ड्राइवर है और तन गाड़ी। इसलिए, यदि जीवन को सही दिशा देनी है, तो सबसे पहले भागते हुए ‘मन’ को वश में करो (घेरो)।जो व्यक्ति अपने तन और मन—दोनों को वश में कर लेता है, वह इतनी शक्ति अर्जित कर लेता है कि एक ‘राई’ (सरसों का छोटा दाना) जैसा साधारण मनुष्य भी ‘सुमेरु’ (स्वर्ण पर्वत) जैसा विशाल,महान और वैभववान बन जाता है।
कबीर के 200 दोहे अर्थ सहित ? हिंदी में संग्रह
11.“कबीर सोई पीर है, जो जाने पर पीर
जो पर पीर न जाने, सो काफिर बेपीर।।”
कबीर कहते हैं— वही सच्चा इंसान (या संत) है ,जो दूसरों के दुख को समझे।
जो दूसरों की पीड़ा से अनजान रहता है, वह धर्महीन और करुणाहीन है।
आज समाज में स्वार्थ बढ़ा है, संवेदना घट रही है
कबीर का यह संदेश कहता है— मानवता, किसी धर्म से ऊपर है। वही पुरुष उत्तम पुरुष है जो दूसरों के पीड़ा को ज्ञात और अनुभव कर सकता है। लेकिन जो दूसरों की पीड़ा को नहीं समझ सकता वह तो नीरा दुष्ट और जालिम है।
12.“तब साहब हूं कारिया, ले चल अपने धाम।
युक्ति संदेश सुनाई हौं, मैं आयो यही काम।।
पूरब जनम तुम ब्राह्मण, सुरति बिसति मौहि।।”
अर्थ: तुमसे प्रेम के कारण मैंने इस जनम तुम्हें दर्शन दिए हैं। मुझे अपने घर ले चलो, मैं जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त करके मोक्ष दिलवाऊंगा।कबीर समाज को चेताते हैं—
पूर्व जन्म या जाति से कोई श्रेष्ठ नहीं होता।यदि स्मृति (सुरति) और विवेक (बिसति) नहीं है तो ब्राह्मण भी ब्राह्मण नहीं रहता।
13. “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने,गोविंद दियो बताए।।”
कबीर ने गुरु को हमेशा भगवान से ऊंचा दर्जा दिया है। तभी तो ये कहते थे।
यदि गुरु और ईश्वर दोनों सामने हों, तो पहले गुरु के चरण छूने चाहिए,
क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर का मार्ग बताया। गुरु ज्ञान का द्वार है।
बिना गुरु के ईश्वर तक पहुँचना संभव नहीं।
आज लोग ज्ञान से पहले सफलता चाहते हैं।
यह दोहा सिखाता है- सही मार्गदर्शक जीवन की दिशा बदल देता है।
14. “चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वही शहंशाह।।”
इच्छाओं और आसक्तियों को वो सभी कष्टों का जड़ मानते थे।जिसकी इच्छाएँ समाप्त हो गईं, उसकी चिंताएँ भी समाप्त हो गईं।
जिसे कुछ नहीं चाहिए, वही सच्चा राजा है।सुख का स्रोत धन नहीं, संतोष है।
आज के तनाव, डिप्रेशन और प्रतिस्पर्धा का मूल—असीम चाहतें।
कबीर कहते हैं—कम चाह, अधिक शांति।
15.“बूड़ा बंस कबीर के, उपजा पुत कमाल।
हरि का सुमिरन छोड़ि के, घर ले आए माल।।”
कबीर कहते हैं—मेरा वंश डूब गया,
क्योंकि मेरी संतान ने ईश्वर-स्मरण छोड़कर केवल धन जोड़ लिया ।
केवल धन कमाना उन्नति नहीं, यदि संस्कार और साधना न हो।
आज शिक्षा का लक्ष्य केवल पैकेज और नौकरी बन गया है।
यह दोहा चेतावनी है- संस्कार बिना सफलता खोखली है।
16. “कहत कबीर सुनहु रे लोई,
हरि बिन राखन हार न कोई।”
कबीर कहते हैं—हे लोगों! सुनो,
ईश्वर के बिना कोई भी सच्चा रक्षक नहीं।
संसार में सब सहारे अस्थायी हैं,
स्थायी सहारा केवल ईश्वर है।
आज लोग पद, पैसा, संबंध पर अत्यधिक निर्भर हैं।
यह दोहा याद दिलाता है- अंतिम सहारा आध्यात्मिक शक्ति ही है।
17. “नारी तो हम भी करि, पाया नाहीं विचार।
जब जाना तब परिहारि, नारी महाविकार।।”
कबीर कहते हैं—मैं भी स्त्री मोह में पड़ा,
पर जब विवेक आया तो समझा कि काम-वासना बड़ा विकार है।
यह दोहा नारी-विरोधी नहीं, बल्कि वासना-विरोधी है।आज
- भोगवाद, अश्लीलता, रिश्तों का वस्तुकरण बढ़ रहा है।
कबीर का संदेश- नारी नहीं, वासना समस्या है
18. “मसि कागद छुयौ नहीं, कलम गह्यौ नहीं हाथ।
चारिक युग को महातम, मुखहिं जनाई बात ।।
कबीर कहते हैं—मैंने न कागज़ छुआ, न कलम पकड़ी,
फिर भी चारों युगों का ज्ञान मुख से कह दिया।
सच्चा ज्ञान अनुभव से आता है, डिग्री या लिखावट से नहीं।
आज ज्ञान को सर्टिफिकेट,डिग्री से तौला जाता है।
कबीर कहते हैं- अनुभव भी ज्ञान का बड़ा स्रोत है।वे निरक्षर थे, लेकिन अपने मौखिक उपदेशों से हीं उन्होंने चारों युगों की बातें लोगों को बता दी।
19. “पाहन पुजे हरि मिले तो, मैं पूजौं पहार
ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार।।
कबीर के दृष्टिकोण से अलग-अलग लोग अलग-अलग तरह से उस एक ही ईश्वर का नाम लेते हैं। धर्म के नाम पर लोगों को बांटने का विरोध करते थे।मुर्ति पूजा का भी विरोध करते थे।
यदि पत्थर पूजने से ईश्वर मिल जाए, तो मैं पहाड़ पूजूँ।उससे तो चक्की अच्छी,
जो संसार का पेट भरती है। निर्जीव मूर्ति-पूजा से अधिक सेवा और उपयोगिता श्रेष्ठ है।आज धर्म अक्सर कर्मकांड तक सीमित हो गया है।
कबीर का स्पष्ट संदेश- सेवा ही सच्ची पूजा है।
20. “चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोए।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय ।।”
कबीर कहते हैं—चलती हुई चक्की को देखकर मैं रो पड़ा,
क्योंकि उसके दो पाटों के बीच जो भी आता है, वह साबुत नहीं बचता।
यह चक्की संसार का प्रतीक है। मनुष्य जन्म और मृत्यु, सुख और दुख,आशा और निराशा के बीच पिसता रहता है।
आज का मनुष्य नौकरी और परिवार, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षा के बीच पिस रहा है।
कबीर चेताते हैं- यदि आत्मबोध नहीं हुआ, तो जीवन केवल पीसने की प्रक्रिया बन जाएगा।
21. “कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढे वन माहिं ।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखें नाहिं ।।”
कस्तूरी हिरण की नाभि में ही रहती है, पर वह उसकी सुगंध जंगल में ढूँढता फिरता है।इसी तरह राम हर हृदय में बसे हैं, पर दुनिया उन्हें बाहर ढूँढती है।
जिस सत्य की खोज हम बाहर करते हैं,वह हमारे भीतर ही होता है।
संकोच और अज्ञान ही भटकाव का कारण है।
आज लोग सुख बाहर ढूँढते हैं शांति वस्तुओं में खोजते हैं ईश्वर को मंदिर-तीर्थ में सीमित कर देते हैं कबीर कहते हैं – आत्मचिंतन के बिना शांति असंभव है।
दुख के बारे में कबीर के कुछ दोहे क्या हैं?
22. “दुख में सुमिरन सब करें ,सुख में करै न कोई
जो सुख में सुमिरन करै ,तो दुख काहे को होय।।”
दुख आने पर तो हर व्यक्ति ईश्वर को याद करता है, पर सुख के समय कोई नहीं करता। यदि सुख में भी ईश्वर-स्मरण किया जाए, तो दुख आने की नौबत ही क्यों पड़े?
कबीर कहते हैं- ईश्वर को स्वार्थ में नहीं, स्वभाव में बसाओ।
जो हर समय संतुलित रहता है, वह दुख से कम प्रभावित होता है।
आज लोग संकट में ही अध्यात्म की ओर जाते हैं
सफलता में अहंकार में डूब जाते हैं
यह दोहा सिखाता है- निरंतर जागरूकता ही मानसिक स्थिरता है।
23. “जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार की, पड़ा रहन दो म्यान ।।”
संत की जाति मत पूछो, उसका ज्ञान देखो। तलवार का मूल्य उसकी धार से होता है,
म्यान (खोल) से नहीं।मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं कर्म और विवेक से होती है।
आज भी समाज में जाति वर्ग पहचान के आधार पर भेदभाव है।कबीर का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है- योग्यता देखो, वंश नहीं।जाति पाति के भेदभाव को भूलकर वह कहते हैं कि ज्ञान से ही सज्जनता आती है और ज्ञानी जानकी कोई जात नहीं होती है ।
24. “हेरत-हेरत हे सखी गया कबीर हिराई।
बूँद समानी समद में , सोकत हरि जाई।।”
कबीर कहते हैं – ब्रह्म और जीवात्मा में कोई भेद नहीं है। इस जीवात्मा से साक्षात्कार ही ब्रह्म को पाना है। इसके लिए ऐसी निष्काम भक्ति की आवश्यकता है जिसमे प्रभु से धन वैभव , सुख, संतान यहाँ तक कि मुक्ति या स्वर्ग की चाह भी नहीं करना चाहिए। आनंद रूपी सागर में बूँद बनकर विलीन हो जाना चाहिए।
यह दोहा अहंकार-विलय और आत्म-समर्पण का प्रतीक है।
जब “मैं” मिटता है, तभी परमात्मा की अनुभूति होती है।
आज व्यक्ति पहचान, ego, self-branding में उलझा है।
कबीर कहते हैं- शांति तब मिलती है, जब “मैं” पीछे हटता है।
25. “ऊँचे कुल क्या जननियाँ , जे करणी ऊँच न होई।
कनक कलस सुरै भरया , साधु निंदा सोई।।”
ऊँचे कुल में जन्म लेने का क्या लाभ, यदि कर्म (आचरण) ऊँचे न हों।
सोने का घड़ा यदि मदिरा से भरा हो, तो वह भी अपवित्र ही कहलाता है।
कबीर कहते हैं-मनुष्य की महानता जन्म से नहीं बल्कि उसके कर्म और चरित्र से होती है।यदि व्यक्ति ईर्ष्या, अहंकार वश यदि साधुओं की निंदा करता है, तो उसका कुल या पद निरर्थक हो जाता है।
आज भी समाज में जाति,वंश,पद का दिखावा किया जाता है।
यह दोहा स्पष्ट संदेश देता है- ऊँची पहचान नहीं, ऊँचा आचरण मूल्यवान है।
कबीर वर्ण व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे। चूँकि स्वयं ऐसे परिवार में पले बढे थे, जो तत्कालीन समाज में अछूत कहलाता था। अतः इस व्यवस्था के दंश को स्वयं झेला था। इसलिए लोगों को समझते थे कि जन्म से सब मनुष्य समान हैं। वे जात -पाँत से कर्मों को श्रेष्ठ मानते थे।
26. “साँच बराबर तप नहीं , झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप।।”
कबीर कहते थे – अगर आपके विचारों में सत्यता नहीं है तो संध्या ,तीर्थ, तप ,व्रत , यज्ञ ,हवन , धार्मिक कर्मकांड ,नमाज अरदास आदि करने कराने का कोई फायदा नहीं हो सकता।
27. “हिन्दू तरुक की एक राह में , सतगुरु है बताई।
कहै कबीर सुनहु हो संतों , राम न कहेउ खुदाई।।
सोइ हिन्दू सो मुसलमान , जिनका रहे इमान।
सो ब्राह्मण जो ब्राह्म मिलाया , काजी सो जाने रहमान।।”
सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ाने के लिए कबीर ने जिस मुखरता से तत्कालीन परिस्थितियों पर प्रहार किया था वे आज भी प्रासंगिक है।
ईश्वर के नाम अलग-अलग हो सकते हैं,पर सत्य एक ही है।
धर्म का सार एकता और प्रेम है, न कि विभाजन।
आज धर्म के नाम पर वैमनस्य,राजनीति, हिंसा फैल रही है।
कबीर का संदेश आज और भी ज़रूरी है- ईश्वर को बाँटने वाला धर्म, धर्म नहीं होता।
28.“जहाँ दया वहाँ धर्म है , जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ आप।।”
कबीर कहते हैं – जहाँ दया है वह धर्म की जड़ है। जहाँ पाप है वह संताप अर्थात दुःख की जड़ है।
जहाँ क्षमा है अर्थात आंतरिक शक्ति की प्रचुरता है।मेरे दृष्टिकोण से जब भी कोई व्यक्ति किसी पर दया करता है।
दया के पात्र व्यक्ति से आंतरिक ख़ुशी की धारा बहती है और उस व्यक्ति के लिए आशीर्वाद निकलता है।
और जब भी किसी भी व्यक्ति के साथ पाप मूलक विचार का व्यवहार करते हैं।
जिसके साथ पाप मूलक व्यवहार करते हैं उसके हृदय में वेदना का ज्वाला फुटता है जो अभिशाप बनकर निकलता है।
इसी तरह जब किसी अभद्र व्यवहार को बर्दास्त करते हुए क्षमा करते हैं तो क्षमाप्रार्थी व्यक्ति के हृदय से आशीर्वाद निकलता है।
इसलिए जब कभी जीवन में दया और क्षमा की जरूरत होती है उसे सबसे पहले मिलता है।जिसके लिए लोग दुआएं करते हैं।
29.“कबीरा खड़ा बाजार में , सबकी माँगे खैर।
ना काहू से दोस्ती , ना काहू से बैर।।
कबीर कहते हैं—मैं संसार रूपी बाज़ार में खड़ा हूँ और सभी के लिए मंगल कामना करता हूँ। मेरा न किसी से पक्षपातपूर्ण मित्रता है, न किसी से शत्रुता। संत का दृष्टिकोण समभाव का होता है।
आज का समाज गुटबाज़ी, पक्षपात “हम बनाम वे” की मानसिकता से भरा है।
यह दोहा सिखाता है- निष्पक्षता और करुणा ही सच्ची महानता है।जो सबका भला चाहे, वही सच्चा मानव है।
30.”जैसी प्रीत कुटुंब सो , तैसी हरि सो होय।
दास कबीरा यूँ कहे , काज न बिगरे कोय।।”
अर्थ: कबीर एक बहुत व्यावहारिक बात कहते हैं—जैसी सहज प्रीति और मोह हमें अपने परिवार (कुटुंब) से होता है, यदि वैसी ही स्वाभाविक लगन ईश्वर (सत्य) से हो जाए, तो मनुष्य का कोई भी कार्य कभी नहीं बिगड़ेगा।भक्ति अगर रिश्ते जैसी हो, तो जीवन सहज हो जाता है।
आज के संदर्भ में सार्थकता: यदि आप अपने काम और अपने लक्ष्यों को ‘हरि’ (परम सत्य) मानकर वैसे ही प्रेम करेंगे जैसे अपने परिवार से करते हैं, तो आपकी Integrity (निष्ठा) बढ़ेगी और असफलता का डर समाप्त हो जाएगा।
कबीर भजन लिखित अर्थ सहित
31.मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना देवल में ना मस्जिद में , ना काबे – कैलास में।।
खोजि होय तो तुरंत मिलि हौं , पल भर की तलाश में।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो ,सब सांसन की साँस में।।
कबीर के अनुसार – ईश्वर कहते हैं तुम मुझे कहाँ ढूँढ रहे हो मैं तो तुम्हारे पास हूँ।ना मैं मंदिर में , ना मजीद में ना मक्का मदीना में और ना ही कैलाश पर्वत पर मिलूंगा। जब भी मुझे खोजोगे हर पल हर साँस में मिलूंगा। मेरे विचार से यही सही है।
कबीर दास के 10 दोहे अर्थ सहित
32. “मन ऐसा निर्मल भया, जैसे गंगा नीर।
पीछे पीछे हरि फिरें , कहत कबीर-कबीर।।“
अर्थ: जब मनुष्य का मन गंगा के जल के समान पवित्र और स्वच्छ हो जाता है (अर्थात विकारों से मुक्त हो जाता है),
तब उसे ईश्वर को खोजने की जरूरत नहीं पड़ती। स्वयं परमात्मा उस भक्त के पीछे-पीछे घूमते हैं और उसे पुकारते हैं।
यह दोहा Character Building (चरित्र निर्माण) पर जोर देता है। हम अक्सर शांति और सफलता को बाहर खोजते हैं।
कबीर कहते हैं कि अपनी “Internal Cleaning” (आंतरिक सफाई) करो।
यदि आपकी नीयत और विचार साफ हैं, तो अवसर (ईश्वर) स्वयं आपके पास चलकर आएंगे।
33.“राम नाम की लूट है , लूट सके तो लूट।
अंत काल पछताएगा , जब प्राण जायेंगे छूट।।“
ईश्वर का नाम लेने का अवसर अभी है,जितना कर सको उतना कर लो।
मृत्यु के समय पछतावा होगा, जब प्राण शरीर छोड़ देंगे।
आज लोग कहते हैं— “बुढ़ापे में धर्म कर लेंगे”
कबीर चेताते हैं- समय का भरोसा नहीं।
34.”जो तोको काँटा बोये , ताहि बोय तू फूल।
तोही फूल के फूल है , बाको है त्रिशूल।।“
जो तुम्हें काँटे बोता है, तुम उसके लिए फूल बोओ।
तुम्हारा परिणाम फूल होगा,उसका परिणाम त्रिशूल (पीड़ा)।
कबीर क्षमा और करुणा का सिद्धांत बताते हैं।
बुराई का उत्तर भलाई से देने वाला ऊँचा होता है।
आज बदले की राजनीति, ट्रोल संस्कृति और हिंसा बढ़ रही है।
कबीर कहते हैं- घृणा का अंत घृणा से नहीं, प्रेम से होता है।
35.”निंदक नियरे राखिये , आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना , निर्मल करे सुभाय ।।“
अर्थ- आलोचक को अपने पास रखो, वह बिना साबुन-पानी के ही
तुम्हारे स्वभाव को शुद्ध कर देगा। सच्ची आलोचना व्यक्ति को निखारती है।
आज लोग आलोचना को अपमान समझ लेते हैं।कबीर सिखाते हैं- सुधार वहीं से शुरू होता है जहाँ असहजता होती है।
36.”सुखिया सब संसार है , खाए और सोए।
दुखिया दास कबीर है , जगे और रोए।।“
अर्थ– संसार के लोग सुखी हैं, खाते हैं और सोते हैं।
कबीर दुखी हैं,क्योंकि वे जागते हैं और संसार की पीड़ा पर रोते हैं।
अज्ञान में डूबा व्यक्ति सुखी लगता है, जाग्रत व्यक्ति समाज की पीड़ा से व्याकुल रहता है।
आज अधिकतर लोग अपनी सुविधा अपने आराम तक सीमित हैं।
कबीर कहते हैं- जागरूकता सुख नहीं, जिम्मेदारी लाती है।
इन दोहों में कबीर समय का मूल्य, करुणा, आत्म-सुधार और सामाजिक चेतना
का संदेश देते हैं। जो जाग गया, वही वास्तव में जी रहा है।
37. “दुर्बल को न सताइए , जाकी मोटी हाय।
बिना जीव की साँस सो, लौह भस्म होइ जाय।।“
कमज़ोर व्यक्ति को मत सताओ, क्योंकि उसकी आह (बददुआ) बहुत प्रभावशाली होती है। जिस प्रकार बिना प्राण के शरीर राख हो जाता है, वैसे ही उसकी आह विनाश कर देती है।कबीर अन्याय और शोषण के विरुद्ध चेतावनी देते हैं।
दुर्बल की पीड़ा ईश्वर तक सीधे पहुँचती है।
आज समाज में गरीब ,मजदूर, कमजोर वर्ग का शोषण आम है।
यह दोहा याद दिलाता है- शक्ति नहीं, न्याय टिकाऊ होता है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ दोहे का अर्थ क्या है?
38.”बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं , फल लगे अति दूर।।”
केवल बड़ा होना किस काम का, यदि खजूर के पेड़ की तरह
न छाया दे, न सुलभ फल। ऊँचा पद या बड़ा कद तब तक व्यर्थ है
जब तक उससे दूसरों का भला न हो।
आज कई लोग बड़े अधिकारी बड़े नेता तो हैं, पर जन-सेवा नहीं करते।
कबीर कहते हैं- महान वही है जो उपयोगी हो।
39.”राम रहीमा एक है, नाम धराया दोय।
कहै कबीरा दो नाम सुनि, भरम परौ माटी कोय।।“
राम और रहीम एक ही ईश्वर हैं, नाम भले अलग हों।
मूर्ख लोग नाम के कारण भ्रम में पड़ जाते हैं।
ईश्वर एक है, धर्म के नाम अनेक हैं। विभाजन मानव का बनाया हुआ है।
आज धर्म के नाम पर संघर्ष, राजनीति ,हिंसा हो रही है।
कबीर का संदेश—नाम नहीं, मानवता महत्वपूर्ण है।
40.”बैल बने हल में जुते, के गाड़ी में दीन।
तेली के कोल्हू रहे, पुनि घेर कसाई जीन।।
मांस कटा बोटी बिकी, चमड़न मढ़ी नक्कार।
कुछ कुकरम बाकी रहे, तीस पर पड़ती मार।।“
कबीर कर्मफल सिद्धांत बताते हैं- जीव अपने पाप कर्मों के कारण
बार-बार अलग-अलग योनियों में दुख भोगता है।
जो व्यक्ति जीवन में हिंसा, क्रूरता, अधर्म
करता है, वह जन्म-जन्मांतर तक दंड पाता है।
आज लोग कहते हैं- “जो करना है इसी जीवन में करो”
कबीर चेताते हैं- कर्म का हिसाब चलता ही रहता है।
41. “कबहु तो राम के नाम को, मोजो कछुवै आहि।
तो मैं बेचा होई हैं, मोहि बतावहु ताहि।।”
इस पद को उनके पुत्र कमाल के गतिविधि पर कहा गया था जब एक राजा से पुत्र द्वारा धन लेकर शिष्य बना डाला। तब कबीरदास जी ने पुत्र कमाल से पूछा तुम धन क्यों लिया तो उसने कहा मैंने धन लेकर “राम नाम” को बेचा नहीं है। वैसे भी “राम नाम” का कोई अस्तित्व और मूल्य नहीं है। हां इस धन का स्वयं उपयोग नहीं करूंगा, इसे दान में ही दूंगा। अतः मैंने कोई गलत काम नहीं किया है।
अर्थ- कबीर कहते हैं- यदि कहीं राम के नाम (ईश्वर-भक्ति) को खरीदा जा सकता हो,
और उसका कोई मूल्य तय हो, तो मुझे वह स्थान बता देना- मैं स्वयं को बेचकर भी उसे खरीद लूँगा।
ईश्वर का नाम और सच्ची भक्ति दुनिया की किसी भी संपत्ति से अधिक मूल्यवान है।
कबीर यह स्पष्ट करते हैं कि भक्ति कोई सौदा नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण है।
आज के समय में धर्म व्यापार बनता जा रहा है पूजा, प्रवचन और चमत्कार “पैकेज” में बिक रहे हैं
यह दोहा चेतावनी देता है- सच्ची भक्ति न धन से खरीदी जा सकती है,
न दिखावे से प्राप्त होती है।कबीर का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है-
ईश्वर बाजार में नहीं, मन में मिलता है।
42.”तुलसीदास ने पांच सौ कोढ़ी किए बहाल।
कितनी कम कीमत हुई, बस एक नाम का कमाल।।“
अर्थ– तुलसीदास ने एक नाम-स्मरण से
पाँच सौ कोढ़ियों को ठीक किया।
यह कितना सस्ता और प्रभावी उपाय है- सिर्फ नाम का प्रभाव।
ईश्वर का नाम धन, दवा और दिखावे से बड़ा है।श्रद्धा में अपार शक्ति है।
आज इलाज और चमत्कार व्यापार बन चुके हैं।
कबीर और तुलसी दोनों कहते हैं- विश्वास सबसे बड़ी औषधि है।
43.”गुरु पारस को अंतरों, जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।“
पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है।पर गुरु और पारस में अंतर है—
गुरु शिष्य को श्रेष्ठ बनाकर कुछ अपने पास रख लेता है।
सच्चा गुरु शिष्य का अहंकार मिटाकर उसे जिम्मेदार और संयमी बनाता है।
आज गुरु भी ब्रांड और व्यवसाय बनते जा रहे हैं।
कबीर कहते हैं- गुरु का मूल्य त्याग और चरित्र से है।
44.”कबीर गर्व न कीजिए , ऊंचा देखि अवास ।
काल परौ भूनी लेटना, ऊपर जमसी घास।।“
भावार्थ–ऊँचे घर या पद को देखकर अहंकार मत करो।
मृत्यु के बाद तुम्हें जमीन में ही लेटना है, ऊपर घास उग जाएगी
संसार की सभी उपलब्धियाँ अस्थायी हैं।अहंकार का अंत निश्चित है।
आज लोग पद ,पैसा, शोहरत पर गर्व करते हैं।
कबीर चेताते हैं- विनम्रता ही स्थायी संपत्ति है।
कबीर दास जी कहते हैं – गलत काम छोड़ दो। इसका फल हमेशा बुरा होता है।
45.”हाथ चढ़ि के जो फिरै, ऊपर चवंर ढुराय।
लोग कहैं सुख भोगने, सीधे दोजख जाय ।।“
जो व्यक्ति सत्ता और वैभव पाकर घमंड में रहता है, लोग उसे सुखी समझते हैं,
पर वह अपने कर्मों से नरक की ओर जाता है।
अहंकार और अत्याचार से मिला सुख वास्तविक सुख नहीं, विनाश का मार्ग है।
आज सत्ता, पद और पैसे का दुरुपयोग आम है।
कबीर चेताते हैं- शक्ति बिना करुणा के विनाशकारी होती है।
47.”जीना थोड़ा ही भला, हरि का सुमिरन होय।
लाख बरस का जीवना, लेखै धरै न कोय।।“
अर्थ- थोड़ा जीवन भी अच्छा है यदि ईश्वर-स्मरण हो।
लंबा जीवन बिना भक्ति के व्यर्थ है।जीवन की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है,
मात्र अवधि नहीं।
आज लोग केवल लंबी उम्र चाहते हैं, अर्थपूर्ण जीवन नहीं।
कबीर कहते हैं- अर्थहीन दीर्घायु बोझ है।
48.”अष्ट सिद्धि नव निधि लौं, सबही मोह की खान।
त्याग मोह की वासना, कहैं कबीर सुजान।।“
आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ भी मोह का कारण हैं। बुद्धिमान वही है
जो मोह का त्याग करे।चमत्कार, शक्ति और धन भी बंधन बन सकते हैं।
आज लोग शक्ति, प्रसिद्धि, फॉलोअर्स के मोह में फँसे हैं।
कबीर कहते हैं- त्याग ही मुक्ति है।
49.”वेद कुरान सब झूठ है, उसमें देखा पोल।
अनुभव की है बात कबीरा, घट परदा देखा खोल।।“
अर्थ– कबीर कहते हैं- शास्त्रों में उलझकर सत्य नहीं मिलता,
सत्य अनुभव से मिलता है। यह शास्त्र-विरोध नहीं,
अंधशास्त्र-आश्रय का विरोध है।आज धर्म
केवल किताबों और भाषणों में सिमट गया है।
कबीर कहते हैं- अनुभव बिना ज्ञान अधूरा है।
50.”उड़ा बगुला प्रेम का,तिनका उड़ा आकाश।
तिनका तिनके से मिला, तिनका तिनके पास।।“
मुख्य भाव: जब मनुष्य के भीतर ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम जागता है, तो उसकी आत्मा (बगुला) सांसारिकता के बंधनों को तोड़कर ऊंचाइयों की ओर उड़ने लगती है। इस प्रेम की आंधी में व्यक्ति का ‘अहंकार’ (तिनका) भी उड़कर विलीन हो जाता है। अंत में, वह छोटी सी आत्मा (तिनका) परमात्मा (महा-तिनके) में विलीन हो जाती है। यह आत्मा का परमात्मा से मिलन की अवस्था है।
प्रेम का प्रभाव ऐसा है कि बिखरे हुए तिनके भी आपस में जुड़ जाते हैं।प्रेम जोड़ता है, अहंकार तोड़ता है।
51.”माटी कहे कुम्हार सो, तू क्या रौंदे मोहि।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रूंदूंगी तोहि।।“
अर्थ- मिट्टी कुम्हार से कहती है- आज तुम मुझे रौंद रहे हो, कल मैं तुम्हें रौंदूँगी।
मृत्यु अटल है।अहंकार निरर्थक है। कबीर याद दिलाते हैं- प्रकृति से बड़ा कोई नहीं।
52.”लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल ।
लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।।
अर्थ– ईश्वर-प्रेम में लीन होकर भक्त स्वयं उसी रंग में रंग जाता है।सच्ची भक्ति में भक्त और भगवान का भेद मिट जाता है।आज भक्ति अक्सर दिखावा है।
कबीर कहते हैं- भक्ति परिवर्तन लाती है।
53. “रे दिल गाफिल, गफलत मत कर।
एक दिन यम आवेगा।
सौदा करने या जग आया, प्रेम लाया मूल गंवाया।
प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्यों आया त्यों जाएगा।।“
अर्थ- हे लापरवाह मन! मृत्यु निश्चित है।संसार में प्रेम लाए बिना
तू खाली लौट जाएगा। जीवन का उद्देश्य प्रेम और आत्मशुद्धि है।
आज लोग कमाते हैं,पर प्रेम नहीं कमाते।
कबीर चेतावनी देते हैं- खाली हाथ जाना तय है।
54.”सुंते भी तकी क्रोध प्रजारा , शिरसे ताज जमीन मारा।
निपट विकल देखा तेहि भाई , तब हम शाह से कह बुझाई।“
कहें कबीर सुनो सुलताना , करो पीर को वचन प्रमाणा।
यह पंक्तियाँ कबीर दास जी और तत्कालीन सुल्तान (सिकंदर लोदी) के बीच हुए संवाद के प्रसंग से जुड़ी मानी जाती हैं। यहाँ कबीर की निर्भीकता और सत्य के प्रति उनके अडिग विश्वास का चित्रण है।
1. अर्थ (Literal Meaning)–कबीर की बातों को सुनकर तकी (सुल्तान का पीर/गुरु) क्रोध की आग में जल उठा।अत्यधिक गुस्से और बौखलाहट में उसने अपने सिर का ताज जमीन पर पटक दिया (यह उसके अपमान और पराजय का संकेत था)।जब कबीर ने अपने उस भाई (तकी) को इस प्रकार व्याकुल और विचलित देखा।तब कबीर ने सुल्तान (शाह) को सत्य समझाते हुए और स्थिति को शांत करते हुए कहा।कबीर कहते हैं—हे सुल्तान! सुनिए।यदि आप कल्याण चाहते हैं, तो केवल सत्य और पीर (सच्चे मार्गदर्शक) के उन्हीं वचनों को प्रमाण मानें जो न्यायपूर्ण हों, न कि क्रोध से भरे हुए।
55. “अम्बर बरसै धरती भीजे ,यहु जाने सब कोई।
धरती बरसै अम्बर भीजे, बूझे बिरला कोई। ।“
आकाश से बारिश होती है और धरती भीगती है, इस बात को तो संसार का हर व्यक्ति जानता और देखता है ,लेकिन जब धरती बरसती है और आकाश भीगता है, इस रहस्य को कोई बिरला (कोई बहुत विशेष या ज्ञानी व्यक्ति) ही समझ पाता है।
- आज हम अपनी खुशी और समाधान के लिए हमेशा ‘बाहर’ (आकाश) की तरफ देखते हैं। कबीर कहते हैं कि समाधान तुम्हारे ‘भीतर’ (धरती) है। जब आप भीतर से बदलना शुरू करते हैं, तो पूरा ब्रह्मांड आपके प्रति बदल जाता है।
56. “हिंदू मैं हूँ नाहीं , मुस्लमान भी नाहीं।
पंचतत्व को पुतला , गैबि खेले माहिं।”
अर्थ: कबीर कहते हैं कि न मैं हिंदू हूँ और न ही मुसलमान। मैं तो बस पाँच तत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर) से बना एक पुतला हूँ, जिसके भीतर वह ‘गैबी’ (अदृश्य परमात्मा) खेल रहा है।
57.”सिंहन के लँहड़े नहीं , हंसन की नहिं पाँत।
लालो की नहीं बोरियॉँ , साधु न चले जमात। “
अर्थ: शेर कभी झुंड (लँहड़े) में नहीं रहते, हंसों की कोई लंबी कतार नहीं होती, कीमती रत्नों (लालों) की बोरियाँ भरकर नहीं रखी जातीं। उसी प्रकार, सच्चा साधु भीड़ या ‘जमात’ बनाकर नहीं चलता, वह अकेला अपनी राह पर चलता है।
भावार्थ: श्रेष्ठ चीजें हमेशा दुर्लभ और निराली होती हैं। सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भीड़ का मोहताज नहीं होता।
58. “यह तन काँचा कुम्भ है , लिया फिरे था साथि।
ढबका लागी फुटि गया, कछु न आया हाथि।”
अर्थ- यह शरीर काँच के घड़े जैसा है, टकराते ही टूट जाता है।
मृत्यु के बाद कुछ भी साथ नहीं जाता।
जीवन क्षणभंगुर है।मोह व्यर्थ है।आज लोग संपत्ति में डूबे हैं।
कबीर याद दिलाते हैं- सब यहीं रह जाएगा।
59.”ज्यों तिल माहीं तेल है , ज्यों चकमक में आगि।
ऐसे घट घट राम हैं , दुनिया देखे नाहिं। “
अर्थ- जैसे तिल में तेल है, चकमक में आग है, वैसे ही हर कण में राम है,
पर दुनिया देख नहीं पाती।
ईश्वर बाहर नहीं, अंदर है।आज लोग मंदिर-मस्जिद खोजते हैं।
कबीर कहते हैं- खुद को खोजो।
60.”संतो पांडे निपुण कसाई।
बकरा मारि भैंसा पर धावै ,
दिल में दर्द न आई।”
अर्थ- दिन में धार्मिक बनते हैं,और हिंसा करते समय दिल में पीड़ा नहीं होती।
यह दोहरा चरित्र है- बाहरी भक्ति, अंदर क्रूरता।आज धर्म के नाम पर
हिंसा होती है। कबीर की सीधी चोट- दया बिना धर्म झूठा है।
61.”दिन को रोज रहत है , रात हनत हो जाय।
मेहि खून यह बंदगी , क्यों कर खुश खुदाय।।“
अर्थ- दिन में रोजा-नमाज़,रात में हत्या।ऐसी भक्ति से ईश्वर कैसे प्रसन्न होगा? कर्म और आचरण भक्ति से बड़ा है आज पूजा-पाठ बढ़ा है,पर मानवता घटी है।कबीर कहते हैं- नैतिकता ही सच्ची इबादत है।
62.”श्रम ही ते सब कुछ बने , बिन श्रम मिले न काहि।
सीधी ऊँगली घी जमो , कबहु निकसै नाहिं।।“
अर्थ: मेहनत (श्रम) से ही सब कुछ प्राप्त होता है, बिना मेहनत के कुछ भी नहीं मिलता। जैसे यदि डिब्बे में घी जम जाए, तो उसे सीधी उंगली से नहीं निकाला जा सकता (उसके लिए उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है यानी अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है)।सफलता के लिए परिश्रम और संघर्ष अनिवार्य है।आज लोग तुरंत परिणाम चाहते हैं।कबीर कहते हैं-बिना मेहनत, बिना परिणाम।
63.”श्रम ही ते सब होत है , जो मन राखे धीर।
श्रम ते खोदत कूप ज्यौं , थल में प्रकटे नीर।“
- अर्थ: यदि मन में धैर्य हो, तो परिश्रम से सब कुछ संभव है। जिस प्रकार सूखी जमीन को लगातार खोदने (परिश्रम) से अंततः जल (नीर) निकल आता है, वैसे ही मेहनत से असंभव कार्य भी सिद्ध होते हैं।कबीर यहाँ धैर्य (Patience) और निरंतरता (Consistency) पर जोर दे रहे हैं।
- आज यह दोहा उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो जल्दी परिणाम न मिलने पर हार मान लेते हैं। सफलता समय और सतत प्रयास मांगती है।
64.”भूखे भजन न होय गोपाला , ले ले तेरी कंठीमाला। “
भावार्थ: कबीर बहुत व्यावहारिक थे। वे जानते थे कि शरीर की प्राथमिक आवश्यकताएँ (भोजन, कपड़ा) पूरी हुए बिना मन आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक नहीं पहुँच सकता।
आज का संदर्भ: यह ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ की महत्ता को दर्शाता है। किसी भी भूखे समाज से नैतिकता या अध्यात्म की उम्मीद करना बेमानी है।
65.”कबीर क्षुधा है कूकरी , करात भजन में भंग।
याको टुकड़ा डार दे , भजन करो निसंक।।“
अर्थ: भूख (क्षुधा) एक कुतिया की तरह है जो बार-बार भौंककर ध्यान भटकाती है और भजन में बाधा डालती है। इसे एक टुकड़ा (भोजन) डालकर शांत कर दो, ताकि तुम बिना किसी चिंता के ईश्वर का ध्यान कर सको।
आज का संदर्भ: जीवन में संतुलन जरूरी है। न तो अत्यधिक भोग में डूबें और न ही शरीर को इतना कष्ट दें कि काम ही न हो सके।
66.”काबा फिर काशी भया , राम भया रहीम।
मोठ चून मैदा भया , बैठ कबीरा जीम।।“
अर्थ: जब भेदभाव की भावना मिट गई, तो मेरे लिए काबा ही काशी हो गया और राम ही रहीम बन गए। जिस मोटे अनाज (मोंठ) को मैं खाने योग्य नहीं समझता था, वह अब मैदा जैसा महीन और सुखद हो गया है। अब कबीर चैन से बैठकर भोजन कर रहा है।जब मनुष्य के मन से सांप्रदायिकता का पर्दा हट जाता है, तो उसे हर जगह एक ही सत्य नजर आता है।
आज का संदर्भ: साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए यह सबसे बेहतरीन सूत्र है। ईश्वर एक है, बस उसे देखने वाले के नजरिए का फर्क है।
67.”सकल जनम शिवपुरी गवाँया।
मरती बार मगहर उठि आया। “
अर्थ: सारा जीवन तो काशी (शिवपुरी) में बिताया, लेकिन जब मरने का समय आया तो कबीर ‘मगहर’ चले आए।
भावार्थ: उस समय अंधविश्वास था कि काशी में मरने वाला स्वर्ग जाता है और मगहर में मरने वाला नरक। कबीर ने इस अंधविश्वास को चुनौती देने के लिए जानबूझकर अंत समय में मगहर को चुना।
आज यह वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper) का प्रतीक है। कबीर सिखाते हैं कि स्थान नहीं, आपके कर्म आपकी गति तय करते हैं।
68.”हम न मरिहै मरिहै संसारा ,
हमको मिला है सिरजनहारा। “
- अर्थ: मैं नहीं मरूँगा, यह संसार मरेगा (जो केवल देह को सत्य मानता है)। मुझे तो वह सृजनहार (परमात्मा) मिल गया है जो अमर है।
- भावार्थ: आत्मा अमर है। जिसने उस परमात्मा को जान लिया, वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। यह आत्मज्ञान की पराकाष्ठा है।
- आज यह मृत्यु के डर (Thanatophobia) से मुक्ति का मार्ग है। जब हम खुद को केवल शरीर न मानकर एक बड़ी शक्ति का हिस्सा मानते हैं, तो जीवन जीने का साहस बढ़ जाता है।
69. “खुलि खेलो संसार में , बाँधि सके न कोई।
घाट जागति का करै ,जो फिर बोझा न होइ।“
अर्थ- इस संसार में निर्भय होकर, खुले मन से जियो।ऐसा जीवन जियो कि कोई तुम्हें बाँध न सके।जाग्रति (ज्ञान) का ऐसा मार्ग अपनाओ कि जीवन फिर बोझ न बने।
भावार्थ- कबीर कहते हैं—जो व्यक्ति ज्ञानपूर्वक, जागरूक होकर जीवन जीता है, वह न मोह में फँसता है, न डर में।उसका जीवन सहज, मुक्त और हल्का हो जाता है।
आज इंसान डर, दिखावे, सामाजिक दबाव, कर्ज और तुलना में जकड़ा हुआ है।
कबीर कहते हैं—जागरूक बनो, फिर नौकरी, रिश्ते, समाज—कोई भी तुम्हें मानसिक गुलाम नहीं बना पाएगा।जागो, समझो, फिर जियो—भागो नहीं।
70. “केवल सत्य विचारा ,जिनका सदा अहारा।
कहे कबीर सुनो भाई साधो , तरे सहित परिवारा।”
अर्थ: जिन्होंने केवल सत्य का ही विचार किया है और सत्य को ही अपने जीवन का आधार (आहार/भोजन) बना लिया है, कबीर कहते हैं कि वे साधु पुरुष स्वयं तो तरते ही हैं, साथ ही अपने पूरे परिवार का भी उद्धार कर देते हैं।
भावार्थ- सत्य केवल बोलने की चीज़ नहीं, जीने की प्रक्रिया है।जो सत्यनिष्ठ होता है, उसकी ऊर्जा पूरे परिवार और समाज को सही दिशा देती है।
- आज झूठ को smartness कहा जाने लगा है।
- “Fake news” और दिखावे के इस युग में Integrity (सत्यनिष्ठा) की भारी कमी है।
- शिक्षक, नेता, अभिभावक—यदि सत्यनिष्ठ हों, तो पीढ़ियाँ सुधर सकती हैं।
आज का संदेश:सत्य अकेले व्यक्ति को नहीं, पूरी पीढ़ी को बचाता है।
71.”न्हाए धोए क्या भया , जो मन मैला न जाय।
मीन सदा जल में रहै , धोए बास न जाय।”
- Mental hygiene आज physical hygiene से ज्यादा जरूरी है।
अर्थ:पवित्र नदियों में शारीरिक मेल धो लेने से कल्याण नहीं होता। इसके लिए भक्ति साधना से मन का मैल साफ करना पड़ता है। जिस प्रकार मछली (मीन) चौबीसों घंटे पानी में रहती है, फिर भी उसकी शारीरिक गंध (बिसांध) नहीं जाती, वैसे ही बिना आंतरिक शुद्धि के बाहरी कर्मकांड व्यर्थ हैं।
भावार्थ: कबीर यहाँ बाह्य आडंबरों और पाखंड पर चोट कर रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि पवित्रता शरीर की नहीं, विचार और नियत की होनी चाहिए।
72. “नैनन रोईं रैन भर, नींद गई परदेस।
सुमिरन साँस समाइया , पग धारिया निज देस।। “
अर्थ और भावार्थ: भक्त या साधक अपने प्रिय (ईश्वर) के वियोग में पूरी रात रोता रहा। वियोग की तड़प इतनी गहरी थी कि नींद आँखों से कोसों दूर चली गई (परदेस हो गई)। यहाँ ‘नींद’ का जाना संसार के प्रति मोह और अज्ञानता के खत्म होने का भी प्रतीक है।
रोते-रोते और याद करते-करते जब प्रभु का सुमिरन (नाम-जप) श्वास-श्वास में समा गया, तब साधक ने अपने वास्तविक घर यानी ‘निज देश’ (आत्मा या परमात्मा के लोक) में कदम रख दिया। जब सुमिरन केवल जीभ से नहीं बल्कि सांसों की गति बन गया, तब जीव का परमात्मा से मिलन हो गया।
1. एकाग्रता और समर्पण (Deep Focus): आज के समय में हमारा मन बहुत बिखरा हुआ है। कबीर कहते हैं कि किसी भी लक्ष्य (चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसारिक) को पाने के लिए उसमें इस कदर डूबना पड़ता है कि चैन-नींद सब एक तरफ हो जाए। यह दोहा ‘Total Commitment’ की सीख देता है।
73. “मन मूरख सोया रहा बोले लाख उपदेस।
भीतर चेतन जागे नहीं , बाहर ज्ञान विशेष।। “
यह मूर्ख मन अज्ञान की नींद में सोया हुआ है, जबकि बाहर से यह लाखों उपदेश झाड़ता रहता है। जब तक भीतर की चेतना (Inward Awareness) नहीं जागती, तब तक बाहर बघारा गया विशेष ज्ञान केवल शब्दों का ढोंग है।कबीर हमें सिखाते हैं कि ‘Information’ (जानकारी) और ‘Wisdom’ (बोध) में अंतर है। बिना आत्म-मंथन के ज्ञान केवल एक मुखौटा है।
आज सोशल मीडिया, मंच, प्रवचन—हर जगह ज्ञान का शोर है।लेकिन आत्मसंयम, करुणा, चरित्र कम दिखता है। Self-awareness के बिना expertise व्यर्थ है।
74. “निरमल गुरु के नाम सों , निरमल साधू भाय।
कोइला होय न ऊजला, सौ मन साबुन लाय।।“
अर्थ: गुरु का नाम और साधु की संगति मन को निर्मल (पवित्र) करने वाली होती है, लेकिन जिसके भीतर की प्रकृति ही मैली है, उसे सुधारा नहीं जा सकता। जैसे कोयले पर चाहे सौ मन साबुन रगड़ लिया जाए, वह अपनी कालिमा नहीं छोड़ता और सफेद नहीं होता।
भावार्थ: यहाँ कबीर संकेत कर रहे हैं कि पात्रता (Eligibility) अनिवार्य है। यदि मन पत्थर जैसा कठोर और कोयले जैसा काला है, तो महान से महान गुरु भी उसे तब तक नहीं बदल सकता जब तक व्यक्ति स्वयं बदलने को तैयार न हो।
आज हम अक्सर सोचते हैं कि अच्छे स्कूल, महंगी वर्कशॉप या मोटिवेशनल स्पीकर हमें बदल देंगे। कबीर याद दिलाते हैं कि सुधार की शुरुआत “स्वयं की नीयत” से होती है। यदि कोई भीतर से सीखना ही न चाहे, तो दुनिया के सारे संसाधन (साबुन) व्यर्थ हैं।
75. “दीपक सूंदर देख करि , जरि -जरि मरे पतंग।
बढ़ी लहर जो विषय की , जरत न मोरै अंग।।“
अर्थ: दीपक की सुंदर लौ को देखकर पतंगा (कीड़ा) उसकी ओर आकर्षित होता है और जलकर मर जाता है। ठीक वैसे ही, जब मनुष्य के भीतर ‘विषयों’ (काम, क्रोध, लोभ, मोह) की लहर बढ़ती है, तो वह भी विनाश की ओर बढ़ता है, लेकिन वह अपने अंगों को उस आग से पीछे नहीं हटाता।
आज के संदर्भ में :विज्ञापन और दिखावे की दुनिया हमें उस ‘चमक’ की ओर खींचती है जो अंततः मानसिक अशांति और कर्ज की आग में झोंक देती है। यह हमें सचेत करता है कि आकर्षण और विनाश के बीच की बारीक रेखा को पहचानें।
76. “भक्ति बिगाड़ी कामिया , इंद्रिन केरे स्वाद।
हीरा खोया हाथ सों , जनम गँवाया बाद।।“
अर्थ: वासनाओं में डूबे हुए (कामी) व्यक्ति ने अपनी भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति को केवल इंद्रियों के स्वाद (क्षणिक सुखों) के चक्कर में नष्ट कर दिया। कबीर कहते हैं कि उसने अपने हाथ में आए ‘मनुष्य जन्म’ रूपी बहुमूल्य हीरे को गँवा दिया और अपना पूरा जीवन व्यर्थ के विवादों और तुच्छ कामों में बिता दिया।
आज ‘Instant Gratification’ (तत्काल सुख) वाली संस्कृति—जहाँ सोशल मीडिया की लाइक्स, जंक फूड और मनोरंजन के साधनों में हम अपना कीमती समय और ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं—यह दोहा उसी की ओर इशारा करता है।
77. “काम क्रोध मध लोभ की , जब लग घट में खान।
कबीर मूरख पंडिता , दोनों एक समान।।“
जब तक शरीर में काम, क्रोध, लोभ, मद और मोह जैसे विकारों का भण्डारण है , कबीर कहते हैं तब तक मुर्ख और पंडित एक जैसे हैं। अर्थात सत्य ज्ञान से इन विकारों को जीत लिया , वह पंडित और जो इनमे फंसा रहा वह मुर्ख।
भावार्थ: पांडित्य या शिक्षा का अर्थ केवल किताबें पढ़ना नहीं है। यदि शिक्षा मनुष्य के चरित्र से इन विकारों को दूर नहीं कर पाई, तो वह शिक्षा व्यर्थ है। अहंकार से भरा हुआ ज्ञानी उस अनपढ़ से बेहतर नहीं है जो अज्ञानी है, क्योंकि दोनों का आचरण एक जैसा ही है।
78. “माया मन की मोहिनी , सुर नर रहे लुभाय।
इन माया सब खाइया , माया कोय न खाय।।“
अर्थ: माया मन को मोहनेवाली , ठगनेवाली है। देवता ,मनुष्य आदि सभी को यह अपने वश में कर लेती है। यह माया सबको जीत लेती है , लेकिन इसे कोई नहीं जीत पाता। पर अंत में वे वस्तुएँ (माया) ही मनुष्य की ऊर्जा और समय को खा जाती हैं।
आज हम सोचते हैं कि हम नई कार या गैजेट का आनंद ले रहे हैं, यह दोहा हमें वस्तुओं का स्वामी बनने की जगह उनका गुलाम न बनने की चेतावनी देता है।
79. “माया तो ठगनी भई, तगात फिरै सब देस।
जा ठग ने ठगनी ठगी , ता ठग को आदेश।।“
अर्थ: यह माया कुशल ठगनी बनकर देश – परदेश के लोगों को ठगती रहती है. लेकिन जो कोई ठग इस ठगनी को ठग लेता है , वह निश्चित ही कोई साधु संत या महत्मा होता है।
भावार्थ: यहाँ ‘ठगना’ शब्द का प्रयोग सकारात्मक अर्थ में हुआ है। जो व्यक्ति विवेक और ज्ञान से माया के धोखे को पहचान लेता है, वही सच्चा विजेता है।
आज के युग में Distractions (भटकाव) बहुत हैं। विज्ञापन, दिखावा और झूठी लाइफस्टाइल हमें ठग रहे हैं। जो व्यक्ति अपनी बुद्धिमानी से इन प्रलोभनों को नजरअंदाज कर अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है, वही आज का ‘सफल ठग’ है जिसने माया को हरा दिया।
80. “जिनके नाम निशान है , तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया , मिटी गया आवा गौन।।“
जिनके हृदय में प्रभु ज्ञान के निशान अंकित हैं , उन्हें मुक्ति मार्ग से कौन भटका सकता है। उनके लिए तो मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं। ऐसे सिद्ध पुरुष तो प्रभु के सत्य -ज्ञान के खजाने को पाकर जीवन – मृत्यु के चक्र से छुटकारा पा जाते हैं।
आज के संदर्भ में: यह दोहा Purpose of Life (जीवन के उद्देश्य) की बात करता है। आज हम छोटी-छोटी समस्याओं में ‘अटक’ जाते हैं क्योंकि हमारे पास कोई बड़ा लक्ष्य या आंतरिक आधार नहीं है। कबीर सिखाते हैं कि यदि आपके पास आत्म-बल का खजाना है, तो बाहरी मुश्किलें आपका रास्ता नहीं रोक सकतीं।
“Inner fulfillment ends endless chasing.“
81. “खुलि खेलो संसार में , बाँधि सकै न कोय।
जाट -जगाती क्या करै, सिर पर पोट न कोय।।“
सांसारिक मोह माया के बंधन से मुक्त होकर संसार में इस तरह विचरण करो कि कोई तुम्हें बांध न सके। यदि मोह-माया , विषय -आसक्ति की गठरी न होगी तो तुम्हें कोई कर अदि भी नहीं चुकाना होगा। अर्थात तुम्हारी मुक्ति निश्चित होगी।
82. “काल फिरै सिर ऊपरे , हाथों धरी कमान।
कहे कबीर गहु नाम को ,छोड़ सकल अभिमान।।“
स्मरण रखें – काल हाथों में धनुष बाण लिए सबके सर पर मँडरा रहा है। इसलिए कबीर कहते हैं कि अपना सारा अभिमान त्यागकर प्रभु नाम को भजो। उसी में मुक्ति है।
83. “कबीर यह मन मसखरा , कहूं तो मानै रोस।
जा मारग साहिब मिलै , तहाँ न चालै कोस।।“
कबीर कहते हैं कि यह मन बड़ा चंचल और मजाकिया है। इसे ज्ञान ध्यान की बातें बुरी लगती है। इसे प्रभु भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए कहो तो उसपर बिलकुल नहीं चलता। अर्थात मन की चंचलता पर काबू पाना कठिन है। कबीर कहते हैं कि सारा अहंकार त्याग कर उस परमात्मा के नाम को पकड़ लो (सुमिरन करो), क्योंकि अंत समय में वही साथ देगा।
आज की Uncertainty (अनिश्चितता) भरी दुनिया में यह दोहा बहुत सटीक है। हम भविष्य की योजनाएं बनाने में इतने व्यस्त हैं कि वर्तमान में ‘इंसानियत’ और ‘अध्यात्म’ भूल गए हैं। यह दोहा हमें Priority Setting (प्राथमिकता तय करने) की सीख देता है—कि धन और पद का अहंकार व्यर्थ है, क्योंकि ये मौत के आगे टिक नहीं सकते।
84. “स्वारथ कूँ स्वारथ मिले, पड़ि -पड़ि लूंबा बूंब।
निष्प्रेही निर्धार को , कोय न राखै झूंब।।“
कई स्वार्थी लोग जब आपस में मिलते हैं तो एक दूसरे की खूब प्रशंसा करते हैं , एक दूसरे को खूब खुश रखने की कोशिश करते हैं; लेकिन जो व्यक्ति निष्काम और निस्स्वार्थ होते हैं , लोग शब्दों से भी उनका आदर नहीं करते हैं।
यह दोहा आज के Self-Discipline (आत्म-अनुशासन) की कमी को दर्शाता है। हम जानते हैं कि व्यायाम, ध्यान और ईमानदारी के रास्ते पर चलना सही है, लेकिन हमारा ‘मसखरा मन’ हमें रील्स देखने, आलस करने या शॉर्टकट अपनाने के लिए उकसाता है। कबीर कहते हैं कि जब तक आप अपने मन की इस चालाकी को नहीं समझेंगे, आप लक्ष्य (साहिब) तक नहीं पहुँच पाएंगे।
85. “माया कू माया मिले ,कर कर लम्बे हाथ।
निष्प्रेही निरधार को गाहक दीनानाथ।।“
अर्थ: संसार का नियम है कि धनवान ही धनवान से हाथ मिलाता है (माया से माया मिलती है)। लेकिन जो ‘निष्प्रेही’ है (जिसकी कोई इच्छा नहीं है) और ‘निरधार’ है (जिसका संसार में कोई सहारा नहीं है), उसका हाथ स्वयं भगवान (दीनानाथ) थामते हैं।
आज की नेटवर्किंग और कॉर्पोरेट दुनिया में लोग केवल उन्हीं से संबंध बनाते हैं जिनसे उन्हें लाभ हो। कबीर याद दिलाते हैं कि जब दुनिया आपका साथ छोड़ दे, तब आपकी निस्वार्थ भावना ही आपको उस परम शक्ति से जोड़ती है जो सबका आधार है।
86. “संसारी से प्रीतड़ी , सरै एको काम।
दुविधा में दोनों गए , माया मिली न राम।”
अर्थ: संसारी (विषय-विकारों में डूबे) व्यक्ति से प्रेम करके एक भी असली काम सिद्ध नहीं होता। ऐसे व्यक्ति की स्थिति ‘दुविधा’ जैसी हो जाती है—न तो उसे संसार की सुख-सुविधाएँ पूरी तरह मिल पाती हैं और न ही उसे राम (अध्यात्म) की प्राप्ति होती है।
आज के संदर्भ में सार्थकता: यह ‘Double Life’ जीने वालों पर कटाक्ष है। आज हम न तो पूरी तरह अपने लक्ष्यों के प्रति ईमानदार हैं और न ही अपने मानसिक सुकून के प्रति। कबीर कहते हैं कि स्पष्टता (Clarity) जरूरी है; आधे-अधूरे मन से किया गया काम कहीं का नहीं छोड़ता।
87. “सुख के संगी स्वारथी , दुःख में रहते दूर।
कहैं कबीर परमारथी , दुःख सुख सदा हुजूर।।“
अर्थ: सुख के समय तो बहुत से स्वार्थी मित्र साथ हो जाते हैं, लेकिन दुःख आते ही वे सब दूर भाग जाते हैं। कबीर कहते हैं कि केवल ‘परमारथी’ (निस्वार्थ प्रेमी या परमात्मा) ही ऐसा है जो सुख और दुःख, दोनों स्थितियों में सदैव आपके साथ खड़ा रहता है।
आज के संदर्भ में सार्थकता: यह दोहा हमें “Fake Friends” की पहचान कराता है। सोशल मीडिया पर हज़ारों ‘फ्रेंड्स’ होने के बावजूद लोग अकेले हैं। कबीर हमें सच्चे संबंधों और आंतरिक ईश्वर पर भरोसा करना सिखाते हैं।
88. “भय से भक्ति करै सबै , भय से पूजा होय।
भय पारस है जीव को, निरभय होय न कोय।।“
अर्थ: अधिकतर लोग डर के कारण ही ईश्वर की भक्ति और पूजा करते हैं। कबीर यहाँ एक गहरा सूत्र देते हैं कि ‘भय’ जीव के लिए ‘पारस पत्थर’ की तरह है, क्योंकि यही डर इंसान को अनुशासन में रखता है और उसे बुराई से बचाता है। पूरी तरह निर्भय (निरंकुश) होकर व्यक्ति पतन की ओर जा सकता है।
आज के संदर्भ में सार्थकता: यहाँ भय का अर्थ ‘डरना’ नहीं, बल्कि ‘Reverence’ (मर्यादा का डर) है। जैसे कानून का डर हमें अपराध से रोकता है, वैसे ही कर्मों का भय हमें नैतिक बनाता है। बिना किसी नैतिक डर (Ethical Fear) के समाज बिखर जाएगा।
89. “यह बिरियाँ तो फिरि नहिं, मन में देखु विचार।
आया लाभहि कारनै , जनम जुआ मति हार।।“
बार-बार मनुष्य जीवन नहीं मिलेगा , इसलिए अच्छी तरह सोच विचार कर लो। सोचो, तुम लाभ के लिए अर्थात मुक्ति के लिए आये हो , इसलिए इस अनमोल जीवन को जुए (व्यर्थ के कामों) में मत हारो।
आज यह दोहा Time Management का सबसे बड़ा उपदेश है। हम अपना समय स्क्रॉलिंग, गपशप और फालतू की चिंताओं में गँवा रहे हैं। कबीर चेतावनी देते हैं कि यह जीवन एक ‘Investment’ है; इसे व्यर्थ न जाने दें।जीवन कमाने की चीज़ नहीं, जीने की चीज़ है।
90. “झूठा सब संसार है कोउ न अपना मीत।
राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत।।“
अर्थ: यह संसार नश्वर है और यहाँ कोई भी स्थाई मित्र नहीं है। जो सत्य (राम नाम) को पहचान लेता है, वही इस संसार रूपी सागर (भौजल) को पार कर पाता है।
आज हम बाहरी रिश्तों और ‘नेटवर्किंग’ पर बहुत निर्भर हैं। कबीर याद दिलाते हैं कि अंततः व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्ति और सत्य के सहारे ही अपनी लड़ाई जीतनी होती है।
91. “एक दिन ऐसा होयगा , कोय कहु का नाहीं।
घर की नारी को कहै , तन की नारी जाँहि।।“
- अर्थ: समय पल पल बीत रहा है एक दिन ऐसा आएगा जब कोई किसी का नहीं रहेगा। यहाँ तक कि जिस घर की स्त्री से मोह है वह पीछे छूट जाएगी और ‘तन की नारी’ (शरीर की नसें/प्राण) भी साथ छोड़ देंगी।
- आज की सार्थकता: यह दोहा हमें Minimalism और Non-attachment सिखाता है। शरीर और संबंधों का अंत निश्चित है, इसलिए इनके अहंकार में पड़कर मानवता नहीं भूलनी चाहिए।जो छूटना तय है, उसी पर घमंड क्यों?
92. “ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै , आपहु शीतल होय।।“
अर्थ: अपने अहंकार (आपा) को त्याग कर ऐसी मधुर भाषा बोलिए जिससे सुनने वाले को शांति मिले और आपके स्वयं के मन को भी शीतलता (सुख) प्राप्त हो।
आज की सार्थकता: सोशल मीडिया पर ‘ट्रोलिंग’ और बढ़ती कड़वाहट के दौर में यह सबसे ज़रूरी मंत्र है। मधुर संवाद न केवल विवाद सुलझाता है, बल्कि आपके मानसिक तनाव (Stress) को भी कम करता है।Soft speech is inner strength, not weakness.
93. इष्ट मिले अरु मन मिले , मिले सकल रस रीति।
कहै कबीर तँह जाइए , यह संतन की प्रीति।।
अर्थ: जहाँ आपके उद्देश्य (इष्ट) मिलें, मन का मेल हो और जहाँ जीवन के सारे रस और विचार मिलते हों, वहीं जाना चाहिए। संतों की प्रीति ऐसी ही तालमेल वाली होती है।
आज की सार्थकता: यह Right Company (सही संगत) चुनने का निर्देश है। ऐसे लोगों के साथ रहें जो आपकी ग्रोथ में सहायक हों और जिनसे आपके विचार मिलते हों, न कि उनके साथ जहाँ केवल नकारात्मकता हो।जहाँ मन सुकून पाए, वही सही जगह है।
94. “संसारी से प्रीतड़ी , सरै न एकौ काम।
दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम।।”
कबीर कहते हैं कि यदि मनुष्य का प्रेम और आसक्ति सांसारिक विषयों में ही लगी रहे,
तो कोई भी कार्य सही ढंग से नहीं बनता। जो व्यक्ति माया और राम—दोनों को एक साथ पाने की कोशिश करता है,वह अंततः दुविधा में पड़कर दोनों से ही वंचित रह जाता है- न उसे माया मिलती है, न ईश्वर। लोग आध्यात्म भी चाहते हैं और
बिना संयम के भोग भी।
95. “जग में बैरी में कोय नहीं, जो मन शीतल होय।
या आपा को डारि दे , दया करे सब कोय।।“
अर्थ: यदि आपका अपना मन शांत और शीतल है, तो संसार में आपका कोई शत्रु नहीं होगा। यदि आप अपने अहंकार (आपा) को त्याग दें, तो हर कोई आप पर दया और प्रेम बरसाएगा।
आज की सार्थकता: यह Conflict Resolution का स्वर्ण नियम है। अक्सर हमारी लड़ाई दूसरों से नहीं, हमारे अपने ‘ईगो’ से होती है। जिस दिन हम झुकना सीख जाते हैं, दुनिया हमारे लिए नरम हो जाती है।Ego down = enemies down.
96. “कबीर संगी साधु का , दल आया भरपूर।
इंद्रिन को तब बाँधिया , या तन कीया घूर।।“
कबीर कहते हैं – जब मन में दया , क्षमा , त्याग , सत्य ज्ञान आदि गुणों की उत्पत्ति होती है और मोह आसक्ति आदि विकारों का नाश होता है तो सभी इन्द्रियाँ स्वतः वश में आ जाती है और यह शरीर हमारे इशारों पर चलने लगता है।
आज की सार्थकता: बुरी आदतों और व्यसनों से लड़ने के लिए अच्छी ‘कम्युनिटी’ या ग्रुप का होना ज़रूरी है। जब हम अच्छे लोगों के साथ जुड़ते हैं, तभी अपनी इंद्रियों (जैसे सोशल मीडिया की लत या गुस्सा) पर नियंत्रण पा सकते हैं।
Environment shapes behaviour.
97. “कबीर मुख सोई भला , जा मुख निकसै राम।
जा मुख राम न निकसै , ता मुख है किस काम।।“
- अर्थ: वही मुख श्रेष्ठ है जिससे सत्य और परमात्मा का नाम निकलता है। जिस मुख से कल्याणकारी शब्द या राम का नाम नहीं निकलता, वह मुख किसी काम का नहीं।
आज के संदर्भ में: यहाँ ‘राम’ का अर्थ सत्य और मधुरता भी है। आज जब लोग अपशब्दों और नफरत भरी बातों का प्रयोग अधिक करते हैं, कबीर याद दिलाते हैं कि आपकी गरिमा आपके शब्दों से है।Meaningful speech > noisy speech.
98. “लम्बे मारग दूर घर , बिकट पंथ बहु मार।
कहो संत क्यों पाइए , दुर्लभ गुरु दीदार।।“
अर्थ: सत्य का मार्ग लंबा है, लक्ष्य (परमात्मा) दूर है और रास्ते में बहुत सी रुकावटें (काम, क्रोध आदि लुटेरे) हैं। ऐसे में गुरु का मार्गदर्शन मिलना अत्यंत कठिन और दुर्लभ है।
आज के संदर्भ में: जीवन में विकल्प बहुत हैं, दिशा नहीं। किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञता या सफलता पाने के लिए ‘Mentor’ (गुरु) का होना जरूरी है। बिना सही गाइडेंस के भटकाव बहुत अधिक है।Right guide saves years of confusion.
99. “ज्ञान दीप परकाश करि , भीतर भवन जराय।
तहाँ सुमिर गुरु नाम को ,सहज समाधि लगाय।।“
अर्थ: अपने भीतर ज्ञान का दीपक जलाकर अज्ञान के अंधेरे को दूर करो। उस आंतरिक शांति में गुरु के नाम का सुमिरन करो और सहज भाव से ध्यान (समाधि) लगाओ।
आज के संदर्भ में: यह Self-Introspection (आत्म-चिंतन) की सीख है। बाहर की शोर-शराबे वाली दुनिया से हटकर कुछ समय मौन और ध्यान में बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है Clarity comes before calm.
कबीर के 100 दोहे कौन से हैं?
100. “सुरति समावे राम में , जग से रहे उदास।
कहैं कबीर गुरु चरणमें , दृढ राखो विश्वास।।‘
अर्थ: अपनी चेतना (सुरति) को परमात्मा में लगाओ और संसार के मोह-माया से अनासक्त (उदास) रहो। अपने गुरु और उनके बताए मार्ग पर अडिग विश्वास रखो।
आज के संदर्भ में: यहाँ ‘उदास’ का अर्थ दुखी होना नहीं, बल्कि ‘Detachment’ है।Over-attachment से burnout होता है। आधुनिक समय में अवसाद से बचने का तरीका यही है कि हम चीजों से उतना ही जुड़ें जितनी जरूरत हो। Inner anchoring creates balance.
101. “कबीर गुरु की भक्ति का , मन में बहुत हुलास।
मन – मनसा माजै नहीं , हों चहत है दास।।“
अर्थ: मन में गुरु की भक्ति का दिखावा तो बहुत है, लेकिन यदि मन की इच्छाओं और बुराइयों को साफ नहीं किया, तो केवल ‘दास’ कहलाने से कुछ हासिल नहीं होगा।
आज के संदर्भ में: केवल ‘Status’ डालने या धार्मिक दिखने से कोई अच्छा इंसान नहीं बनता। लोग spirituality चाहते हैं, discipline नहीं। चरित्र की सफाई (Integrity) असली चीज है।Devotion needs inner cleaning.
102. “प्रेम बिना जो भक्ति है , सो निज दम्भ विचार।
उदर भरन के कारन, जनम गवाएँ सार।।“
प्रेम के बिना की गई भक्ति पाखंड के शिव कुछ नहीं है। यह तो पेट भरने के लिए की गयी स्वार्थपरक भक्ति है , जो जीवन को सारहीन करने के समान है।
अर्थ
प्रेम के बिना की गई भक्ति केवल पाखंड है।
पेट भरने के लिए भक्ति करने वाले जीवन का सार खो देते हैं।
भावार्थ
भक्ति यदि पेशा बन जाए, तो मुक्ति नहीं देती।
आज के संदर्भ में
अर्थ: बिना प्रेम के भक्ति केवल पाखंड (दम्भ) है। जो लोग केवल पेट भरने (स्वार्थ) के लिए भक्ति करते हैं, वे जीवन व्यर्थ गँवाते हैं।
आज के संदर्भ में: प्रेम के बिना कोई भी सेवा या रिश्ता सफल नहीं होता।
Spiritual business everywhere.
Authenticity > performance.
103. “जब लग भक्ति सकाम है , तब लग निष्फल सेव।
कहैं कबीर वह क्यों मिलै , निह्कामी निज देह।।“
फल की आशा से की जानेवाली भक्ति से कल्याण नहीं हो सकता। कबीर कहते हैं कि हमारा अंतरात्मा तो निष्काम है , उसे सकाम भक्ति से कैसे प्रसन्न किया जा सकता है। अर्थात अंतर को जानने के लिए निष्काम भावना जरूरी है।
104. “कामी क्रोधी लालची , इनते भक्ति न होय।
भक्ति करै कोई सूरमा , जाति बरन कुल खोय।“
अर्थ: काम, क्रोध और लोभ में डूबे व्यक्ति से भक्ति नहीं हो सकती। सच्चा भक्त वही ‘सूरमा’ (वीर) है जो अपने अहंकार, जाति और कुल के अभिमान को त्याग दे।
भक्ति का अर्थ यहाँ ‘समर्पण’ है, जो केवल साहसी लोग ही कर सकते हैं, डरपोक या स्वार्थी नहीं।Identity pride divides. Spiritual courage unites.
105. “कबीर आप ठगाइए , और न ठगिए कोय।
आप ठगे सुख उपजै ,और ठगे दुःख होय।।”
अर्थ: खुद ठगे जाना बेहतर है, पर किसी दूसरे को मत ठगो। जब आप खुद धोखा खाते हैं, तो मन में शांति रहती है कि आपने पाप नहीं किया, लेकिन दूसरों को ठगने पर अंततः दुःख ही मिलता है।
आज के संदर्भ में: यह Ethics (नीतिशास्त्र) का बड़ा पाठ है। भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी से कमाया पैसा मानसिक अशांति ही लाता है।
Self-sacrifice creates peace; exploitation creates pain.
106. “खाय पकाय लुटाय ले, यह मनुवा मिजमान।
लेना हो सो लेइ ले , यही गोय मैदान।।“
अर्थ: यह मनुष्य जीवन एक मेहमान की तरह है। जो कुछ अच्छा कर सकते हो, दान कर सकते हो या ज्ञान पा सकते हो, वह अभी कर लो। सुनी-सुनाई बातों (रूढ़ियों) में मत पड़ो, क्योंकि वे केवल जन्म-मरण के चक्र में फँसाती हैं। अनुभव का लाभ अभी उठाओ।
आज के संदर्भ में: ‘कल’ कभी नहीं आता। सामाजिक रूढ़ियों और दूसरों की बातों में आने के बजाय अपने अनुभव और विवेक से तुरंत सही कार्य (Procrastination छोड़कर) शुरू करना चाहिए।
107. लेना होय सो जल्द ले , कही सुनी मत मान।
कही – सुनी जुग -जुग चली, आवागामन बँधान।।
कबीर कहते हैं कि यदि तुम्हें जीवन में कुछ सार्थक प्राप्त करना है—चाहे वह ज्ञान हो, भक्ति हो, या कोई शुभ कार्य—तो उसे बिना देरी किए तुरंत कर लो। “कल” पर टालना ही सबसे बड़ी भूल है।
दूसरों की कही-सुनी बातों, रूढ़ियों, परंपराओं या किंवदंतियों पर आँख मूंदकर भरोसा मत करो। जब तक तुम स्वयं सत्य का अनुभव न कर लो, तब तक उसे सच मत मानो।
संसार में सुनी-सुनाई बातें और अंधविश्वास युगों-युगों से चले आ रहे हैं। लोग बिना सोचे-समझे इनका अनुसरण करते हैं और इसी कारण वे जन्म-मरण (आवागमन) के चक्र और मानसिक गुलामी में बँधे रहते हैं। वे कभी मुक्त होकर सत्य को नहीं देख पाते।
आज के संदर्भ में: “Fake News” और सूचना का युग: आज के समय में हम वाट्सएप यूनिवर्सिटी और सोशल मीडिया की ‘कही-सुनी’ बातों पर तुरंत यकीन कर लेते हैं। किसी भी बात को मानने से पहले उसकी पुष्टि करें और अपने विवेक का इस्तेमाल करें।स्वयं का मार्ग खोजें और अपनी बुद्धि से निर्णय लें।उधार का ज्ञान काम नहीं आता; जो आनंद और सीख हमें स्वयं के अनुभव से मिलेगी, वही स्थाई होगी।
108. कहैं कबीर देय तू , जब लग तेरी देह।
देह खेह हो जाएगी , कौन कहेगा देह।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि जब तक यह शरीर जीवित है, दूसरों की मदद करो और दान दो। एक दिन यह शरीर मिट्टी (खेह) हो जाएगा, फिर कोई इसे ‘देह’ कहकर भी नहीं पुकारेगा।
आज के संदर्भ में: यह Legacy (विरासत) की बात है। व्यक्ति अपने शरीर से नहीं, अपने कार्यों से याद रखा जाता है। यह दोहा हमें परोपकारी बनने की प्रेरणा देता है।लोग कहते हैं “बाद में करेंगे।”
Later often becomes never.
109. गुरु आज्ञा मानै नहीं , चलै अटपटी चाल।
लोक वेद गए , आए सिर पर काल।।
अर्थ: जो शिष्य गुरु के मार्गर्दर्शन (आज्ञा) की अवहेलना करता है और मनमर्जी की टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलता है, वह न तो संसार में सम्मान पाता है (लोक) और न ही उसे आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है (वेद)। अंततः वह अपना जीवन व्यर्थ गँवा देता है और मृत्यु (काल) उसे बिना किसी उपलब्धि के दबोच लेती है।
भावार्थ: गुरु यहाँ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि ‘सही सिद्धांत’ और ‘विवेक’ का प्रतीक है। जब व्यक्ति अपने अहंकार में आकर सही सलाह को ठुकरा देता है, तो वह अपना ही नुकसान करता है।
आज के संदर्भ में : आज की “I know everything” वाली पीढ़ी के लिए यह एक चेतावनी है। चाहे करियर हो या व्यक्तिगत विकास, जब हम अनुभव और अनुशासन (Mentor’s Guidance) को नकार कर मनमानी करते हैं, तो हम अपना सामाजिक आधार और मानसिक शांति दोनों खो देते हैं।आज लोग ज्ञानतो लेते हैं, पर मार्गदर्शननहीं मानते। हर कोई खुद को विशेषज्ञ समझता है। Mentor के बिना mastery नहीं आती।
110. यह मन ताको दीजिए , साँचा सेवक होय।
सिर ऊपर आरा सहै , तउ न दूजा होय।।
अर्थ: अपना मन (अपना पूर्ण समर्पण) केवल उसे देना चाहिए जो सच्चा सेवक हो। सच्चा सेवक वह है जो अपने सत्य और अपने मार्ग पर इतना अडिग हो कि यदि उसके सिर पर आरा भी चला दिया जाए (घोर कष्ट भी दिए जाएं), तो भी उसके मन में अपने लक्ष्य या गुरु के प्रति कोई दूसरा विचार (भटकाव) न आए।कबीर कहते हैं कि सत्य के मार्ग पर चलने वाले को हर कठिन परिस्थिति में दृढ संकल्प के साथ अडिग रहना चाहिए।
आज के संदर्भ में सार्थकता: यह दोहा Resilience (झेलने की शक्ति) और Commitment (प्रतिबद्धता) की बात करता है। आज हम बहुत जल्दी हार मान लेते हैं या अपना रास्ता बदल लेते हैं। कबीर सिखाते हैं कि जो व्यक्ति मुश्किलों के बावजूद अपने सिद्धांतों पर टिका रहता है, वही वास्तव में सफल और ‘साँचा’ कहलाता है।True commitment is tested under pressure.
111. शीलवंत सुर ज्ञान मत, अति उदार चित्त होय।
लज्जावान अति निछलता , कोमल हिरदा सोया।।
अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष वह है जो शीलवान (चरित्रवान) हो, जिसकी बुद्धि दिव्य ज्ञान से युक्त हो और जिसका हृदय अत्यंत उदार (बड़ा) हो। वह मर्यादित (लज्जावान) होता है, उसके भीतर कोई छल-कपट नहीं होता (निछलता) और उसका हृदय अत्यंत कोमल होता है।
आज की दुनिया में ‘Soft Skills’ और ‘Emotional Intelligence’ की बात की जाती है। कबीर सदियों पहले कह गए कि असली ताकत कठोरता में नहीं, बल्कि शील, उदारता और निष्कपट होने में है। यह व्यक्तित्व विकास (Personality Development) का सबसे उत्तम सूत्र है।Wisdom without compassion is incomplete.
112. ज्ञानी अभिमानी नहीं ,सब काहू सो सेत।
सत्यवान परमारथी, आदर भाव सहेत।।
अर्थ: सच्चा ज्ञानी वह है जिसे अपने ज्ञान का अहंकार न हो। वह सभी के साथ समान भाव (सेत/सफेद/शुद्ध भाव) से मिलता है। वह सत्य बोलने वाला, परोपकारी (परमारथी) होता है और सबके प्रति आदर का भाव रखता है।
आज अक्सर ज्ञान आने पर व्यक्ति में अहंकार (Ego) आ जाता है। कबीर सिखाते हैं कि सच्चा ज्ञान विनम्रता लाता है। आज के लीडर्स के लिए यह जरूरी है कि वे दूसरों का सम्मान करें और अपने ज्ञान का उपयोग स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परोपकार के लिए करें।True knowledge makes you inclusive, not exclusive.
113. रक्त छाड़ि पय को गहै , ज्यौरे गऊ का बच्छ।
औगुण छाँड़ै गुण गहै , ऐसा साधु लच्छ।।
- अर्थ: जिस प्रकार गाय का बछड़ा (बच्छ) केवल दूध (पय) को ग्रहण करता है और रक्त को छोड़ देता है, ठीक वैसे ही सज्जन पुरुष दूसरों के दोषों (औगुणों) को छोड़कर केवल उनके गुणों को ग्रहण करते हैं। यही एक सच्चे साधु का लक्षण है।
- आज की सार्थकता: आज हम दूसरों की आलोचना और बुराइयां खोजने में बहुत समय व्यतीत करते हैं। यह दोहा हमें “Positive Mindset” की सीख देता है। यदि हम केवल अच्छाइयों पर ध्यान दें, तो हमारा अपना जीवन भी सकारात्मक हो जाएगा।Growth comes from absorbing good, not highlighting bad.
114. कमल पत्र हैं साधु जन, बसै जगत के माहिं।
बालक केरि धाय ज्यों , अपना जानत नाहिं।।
अर्थ: साधु पुरुष संसार में वैसे ही रहते हैं जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी उससे भीगता नहीं (अलिप्त रहता है)। उनकी स्थिति उस ‘धाय’ (पालने वाली माँ) की तरह होती है जो बालक की सेवा तो पूरी ममता से करती है, पर जानती है कि यह बालक उसका अपना नहीं है।
आज की सार्थकता: यह ‘Detached Attachment’ का अद्भुत सिद्धांत है। हम अपनी नौकरी, संपत्ति और रिश्तों में इतने डूब जाते हैं कि तनावग्रस्त हो जाते हैं। यह दोहा सिखाता है कि अपनी जिम्मेदारियां पूरी ईमानदारी से निभाओ (धाय की तरह), लेकिन यह याद रखो कि अंततः कुछ भी स्थाई नहीं है। इससे मानसिक शांति बनी रहती है। Balance is the highest spirituality.
115. बहता पानी निरमला , बंधा गन्दा होय।
साधु जन रमता भला , दाग न लगाई कोय।।
- अर्थ: जिस प्रकार बहता हुआ पानी हमेशा स्वच्छ और निर्मल रहता है, जबकि एक जगह रुका हुआ पानी सड़ जाता है और गंदा हो जाता है, ठीक उसी प्रकार साधु (सज्जन पुरुष) वही श्रेष्ठ है जो विचरण करता रहे (रमता रहे)। एक जगह रुकने या मोह-माया में फँसने से दोष उत्पन्न हो सकते हैं।
- आज यह दोहा “Growth Mindset” और परिवर्तन का प्रतीक है। यदि हम अपने विचारों को रूढ़िवादी बना लेंगे और बदलाव को स्वीकार नहीं करेंगे, तो हमारी सोच में “जंग” लग जाएगी। निरंतर सीखना, बदलना और सेवा में लगे रहना- मानसिक और आध्यात्मिक शुद्धि का आधार है।
116. ढोल दमामा गड़फड़ी , सहनाई औ तूर।
तीनों निकसै न बाहुरैं , साधु सती और शूर।।
अर्थ: जब युद्ध का नगाड़ा (दमामा) और शहनाई बजती है, तब तीन लोग ऐसे होते हैं जो घर से एक बार निकल गए तो पीछे मुड़कर नहीं देखते—साधु (सत्य की राह पर), सती (त्याग की राह पर) और शूर (वीर योद्धा)। इनका संकल्प अटूट होता है।
आज यह ‘Commitment’ (प्रतिबद्धता) की पराकाष्ठा है। आज के दौर में हम बहुत जल्दी अपने वादों और लक्ष्यों से पीछे हट जाते हैं। कबीर सिखाते हैं कि महान कार्यों के लिए जिस साहस और दृढ़ता की आवश्यकता होती है, वह एक बार के अटूट निर्णय से आती है। True greatness is quiet.
117. तुटै बरत अकास सों , कौन सकत है झेल।
साधु सती और सूर का, अनि ऊपर का खेल।।
अर्थ: आकाश से टूटती हुई बिजली या उल्का को झेलना किसी के बस की बात नहीं है। वैसे ही साधु, सती और शूरवीर का जो मार्ग है, वह आग के ऊपर चलने जैसा कठिन खेल है। फिर भी साधु सती और शूरवीरों का संकल्प इतना कठिन होता है कि न तो उसे तोड़ा जा सकता है, न उसका मुकाबला किया जा सकता है ।इनके त्याग और साहस को साधारण व्यक्ति नहीं समझ सकता।
आज यह दोहा हमें सिखाता है कि सत्य, ईमानदारी और देश-सेवा का मार्ग आसान नहीं है। यह “अग्नि परीक्षा” की तरह है। जो लोग समाज में बदलाव लाना चाहते हैं, उन्हें इस ‘कठिन खेल’ के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। Pressure reveals character.
118. गुरु मूरति गति चन्द्रमा , सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे , गुरु मूरति की ओर।.
अर्थ: गुरु की छवि चंद्रमा के समान शीतल और प्रकाशवान है, और शिष्य (सेवक) की आँखें चकोर पक्षी की तरह हैं। जैसे चकोर पूरी रात चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही शिष्य आठों पहर (24 घंटे) अपने गुरु के ज्ञान और उनकी मूरति का ध्यान करता रहता है।
आज के संदर्भ में सार्थकता: यहाँ गुरु का अर्थ केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि आपका ‘Vision’ या ‘Goal’ भी हो सकता है। यदि आप अपने लक्ष्य के प्रति ‘चकोर’ की तरह एकाग्र (Focused) हैं, तो सफलता निश्चित है। यह दोहा अत्यधिक एकाग्रता (Deep Focus) की प्रेरणा देता है। Transformation needs sustained attention.
119. गुरु मूरति आगे खड़ी , दुविया भेद कछु नाहिं।
उन्हीं कूँ प्रणाम करि , सकल तिमिर मिटी जाहिं।।
अर्थ: जब गुरु की साक्षात मूरति सामने खड़ी हो, तो मन में कोई दुविधा या द्वैत (भेद) नहीं रहना चाहिए। उन्हीं के चरणों में पूर्ण समर्पण के साथ प्रणाम करने से अज्ञान का सारा अंधेरा (तिमिर) स्वतः ही मिट जाता है।
आज हम अक्सर ज्ञान के कई स्रोतों के बीच भटकते हैं (Information Overload)। यह दोहा सिखाता है कि जब आपको एक सही मार्गदर्शक या ‘मेंटोर’ मिल जाए, तो अपनी शंकाएं छोड़कर उनके अनुभव पर भरोसा करना चाहिए। अटूट विश्वास ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।
120. ज्ञान समागम प्रेम सुख , दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइए , सदगुरु चरण निवास।।
अर्थ: सच्चा ज्ञान, सत्संग का सुख, निस्वार्थ प्रेम, दया की भावना, सच्ची भक्ति और अडिग विश्वास—ये सभी अनमोल गुण गुरु की सेवा और उनके चरणों में रहने (उनके सानिध्य) से ही प्राप्त होते हैं।
आज हम ‘Soft Skills’ जैसे समानुभूति, धैर्य और नैतिकता को किताबों में ढूंढते हैं। कबीर बताते हैं कि ये गुण केवल पढ़ने से नहीं, बल्कि किसी अनुभवी और चरित्रवान व्यक्ति की छत्रछाया में रहकर सीखने (Mentorship) से आते हैं।
121.कबीर ते नर अंध हैं , गुरु को कहते और।
हरि के रूठे ठौर है , गुरु रूठे नहिं ठौर।।
जहाँ गुरु का सम्मान, वहाँ अज्ञान का अंत।
जहाँ अहंकार का त्याग, वहाँ ईश्वर का वास।
कबीर उन लोगों को नेत्रहीन मानते हैं जो गुरु को महत्वहीन समझते हैं। वे कहते हैं की भगवान के रूठने पर स्थान मिल सकता है , लेकिन गुरु के रूठने पर कहीं ठिकाना नहीं मिलता।
गुरु = ज्ञान का प्रकाश
गुरु सेवा = जीवन मूल्य
गुरु से विमुखता = अंधकार
अहंकार त्याग = ईश्वर प्राप्ति
अर्थ: वे लोग विवेकहीन (अंधे) हैं जो गुरु को केवल एक साधारण मनुष्य समझते हैं। कबीर कहते हैं कि यदि ईश्वर (हरि) आपसे नाराज हो जाएं, तो गुरु के पास शरण (ठौर) मिल सकती है, लेकिन यदि गुरु ही आपसे विमुख हो गए, तो फिर ब्रह्मांड में कहीं भी ठिकाना नहीं मिलेगा।
आज यह अनुशासन और मार्गदर्शन की महत्ता बताता है। यदि हम अपने जीवन के सिद्धांतों और मार्गदर्शकों का अपमान करते हैं, तो हमारे पास कोई ‘Safety Net’ नहीं बचता। गुरु वह पुल है जो हमें मुश्किलों (ईश्वर की नाराजगी या जीवन के संकट) से बाहर निकालता है।
122.तन- मन ताको दीजिए , जाको विषया नाहिं।
आपा सब हीं डारि के , राखे साहिब माहिं।।
अर्थ: अपना तन और मन केवल उसे समर्पित करें जो स्वयं विषयों (लालच, वासना, स्वार्थ) से मुक्त हो। अपना सारा अहंकार (आपा) त्याग कर जो स्वयं को परमात्मा (साहिब) में लीन रखता हो, वही समर्पण के योग्य है।
आज यह ‘चुनाव’ की बात करता है। आज के समय में “गुरु” या “लीडर” चुनते समय सावधानी बरतनी चाहिए। हमें केवल उसी का अनुसरण करना चाहिए जिसका अपना चरित्र बेदाग हो और जो स्वार्थ से ऊपर उठकर काम करता हो। समर्पण सोच-समझकर करो। जो विषय आसक्तियों से मुक्त हो , जो आपको सच्चा ज्ञान दे सके और अंतर की पहचान करा सके।
123. साधु विहंगम सुरसरी ,चले विहंगम चाल।
जो जो गलियां नीकसे , सो सो करे निहाल।।
अर्थ: सच्चा साधु, विहंगम (पक्षी) और सुरसरी (गंगा) एक समान होते हैं। जैसे गंगा जिस रास्ते से गुजरती है, वहाँ की धरती को निहाल (उपजाऊ और पवित्र) कर देती है, वैसे ही सच्चे संत जिस भी रास्ते या गली से गुजरते हैं, अपने ज्ञान और आचरण से वहाँ के लोगों का कल्याण कर देते हैं।
आज यह ‘Positive Influence’ (सकारात्मक प्रभाव) की बात है। एक प्रभावशाली और नेक इंसान जहाँ भी जाता है, अपने विचारों से वातावरण को बेहतर बना देता है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने व्यक्तित्व को ऐसा बनाएँ कि हमारी उपस्थिति दूसरों के लिए लाभदायक हो।
124. चाल बकुल की चली हैं , बहुरि कहावै हंस।
ते मुक्त कैसे चुगे , पड़े काल के फंस।।
अर्थ: जो लोग आचरण तो बगुले (छल-कपट) जैसा रखते हैं, लेकिन खुद को हंस (ज्ञानी या पवित्र) कहलाते हैं, क्योंकि वे मोती और कंकड़ में भेद नहीं कर सकते।वे कभी सत्य रूपी मोती नहीं चुग सकते। वे केवल ढोंग के कारण समय (काल) के जाल में फँसकर रह जाते हैं और कभी मुक्त नहीं होते।
आज यह दोहा उन लोगों के लिए है जो बाहर से ‘Professional’ या ‘सभ्य’ दिखने का नाटक करते हैं, पर भीतर से ईर्ष्या और छल से भरे होते हैं। कबीर कहते हैं कि सफलता का ढोंग करने से आप सफल नहीं होते, बल्कि अपनी ही बुनी हुई जटिलताओं में फँस जाते हैं।
125. माला तिलक लगाय के , भक्ति न आयी हाथ।
दाढ़ी मूँछ मुंडाय के , चले दूनी के साथ।।
अर्थ: केवल माला पहनने या तिलक लगाने से भक्ति प्राप्त नहीं होती, और न ही सिर या दाढ़ी-मूँछ मुँडा लेने से कोई वैरागी बनता है। यदि मन में अभी भी दुनियादारी (दूनी) का लालच और वासना भरी है, तो ये सारे बाहरी भेष व्यर्थ हैं।
आज के संदर्भ में सार्थकता: आज के समय में ‘Personal Branding’ और ‘दिखावा’ बहुत बढ़ गया है। लोग सोशल मीडिया पर दार्शनिक बातें करते हैं, पर असल जीवन में उनके मूल्य शून्य होते हैं। कबीर हमें ‘Branding’ के बजाय ‘Character’ (चरित्र) पर ध्यान देने की प्रेरणा देते हैं।
126. मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग।
तासों तो कौवा भला , तन मन एकहिं अंग।।
अर्थ: उस बगुले से तो कौवा कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है, क्योंकि बगुला सफेद (ऊजरा) शरीर रखकर भी मन में मछली पकड़ने का कपट रखता है।ढोंगी हंस से सच्चा कौवा बेहतर है, क्योंकि सत्य वहाँ है जहाँ तन–मन एक हों।जबकि कौवा बाहर और भीतर से एक जैसा काला है—उसमें कम से कम कोई पाखंड या दिखावा तो नहीं है।
आज यह Authenticity (प्रामाणिकता) का सबसे बड़ा पाठ है। कबीर कहते हैं कि अपनी कमियों के साथ ‘असली’ (Genuine) रहना उस ‘झूठी अच्छाई’ से बेहतर है जो केवल दूसरों को ठगने के लिए पहनी गई हो। आज की बनावटी दुनिया में स्पष्टवादी और पारदर्शी होना ही सबसे बड़ा गुण है।जैसे हो, वैसे ही रहो; दोहरा मत बनो।
127.आया प्रेम कहाँ गया , देखा था सब कोय।
छिन रोवै छिन में हँसै , सो तो प्रेम न होय।।
अर्थ: लोग कहते हैं कि प्रेम आया था, पर वह गया कहाँ? सबने उसे देखा था। लेकिन जो क्षण में रोता है और अगले ही क्षण हँसने लगता है (यानी जिसका भाव बदलता रहता है), वह वास्तविक प्रेम नहीं है। सच्चा प्रेम स्थिर और गंभीर होता है।
आज यह ‘Infatuation’ (क्षणिक आकर्षण) और सच्चे प्रेम के बीच का अंतर बताता है। आज के दौर में जिसे हम ‘मू़ड स्विंग्स’ या अस्थायी आकर्षण कहते हैं, कबीर उसे प्रेम नहीं मानते जो परिस्थितियों से डगमगा जाए। प्रेम में एक ठहराव और गहराई होती है।
128. जा घट प्रेम न संचरै , सो घट जानु।
जैसे खाल लुहार की , सांस लेत बिन प्राण।।
अर्थ: जिस हृदय (घट) में प्रेम का संचार नहीं होता, वह शरीर एक श्मशान (मसान) के समान है। वह ठीक वैसा ही है जैसे लुहार की धौंकनी (खाल), जो हवा तो अंदर-बाहर करती है (सांस लेती है), पर उसमें कोई जीवन या प्राण नहीं होते।
आज की सार्थकता: यह Emotional Intelligence की पराकाष्ठा है। बिना संवेदना, करुणा और प्रेम के मनुष्य केवल एक मशीन है। कबीर कहते हैं कि जीवित होने का अर्थ केवल सांस लेना नहीं, बल्कि हृदय में प्रेम का होना है।
129. गोता मारा सिंधु में , मोती लाए पैठि।
वह क्या मोती पाऐंगे , रहे किनारे बैठि।।
अर्थ: जिन्होंने गहरे समुद्र (सिंधु) में गोता लगाया, वे ही गहराई में जाकर मोती ढूंढ कर लाए। जो डर के मारे केवल किनारे पर बैठे रहे, उन्हें मोती कभी प्राप्त नहीं हो सकते।
आज यह ‘Risk Taking’ और ‘Hard Work’ का संदेश है। सफलता उन्हीं को मिलती है जो गहराई में उतरकर (मेहनत करके) जोखिम उठाते हैं। जो लोग केवल सुरक्षित रहकर (Comfort zone) फल की इच्छा करते हैं, उनके हाथ कुछ नहीं आता। चाहे ज्ञान हो, प्रेम हो या सफलता- बिना गहराई में उतरे, कुछ भी मूल्यवान चीजें नहीं मिलता।
130. अधिक सनेही माछरी , दूजा अलप सनेह।
जब ही जलते बीछुरै , तब ही त्यागै देह।।
अर्थ: मछली का जल से प्रेम (स्नेह) सबसे अधिक और सच्चा है, बाकी सब अल्प (कम) हैं। क्योंकि मछली जैसे ही अपने प्रिय जल से बिछड़ती है, वह तुरंत अपने प्राण त्याग देती है। वह जल के बिना एक क्षण भी जीवित रहने का नाटक नहीं करती।
आज यह ‘Ultimate Commitment’ (अटूट प्रतिबद्धता) का उदाहरण है। यह हमें सिखाता है कि जिस लक्ष्य या सत्य से हम जुड़े हैं, उसके प्रति हमारी निष्ठा मछली की तरह होनी चाहिए—पूर्ण और अनन्य।जहाँ विकल्प हों, वहाँ पूर्ण प्रेम नहीं।
131. जब मैं था तब गुरु नहीं ,अब गुरु हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी , तामे दो न समाँहि।।
अर्थ: जब तक मेरे भीतर ‘मैं’ (अहंकार/Ego) था, तब तक गुरु (ज्ञान) का प्रवेश नहीं हो सका। अब जब गुरु का ज्ञान मिल गया, तो मेरा ‘अहंकार’ मिट गया। प्रेम की गली इतनी तंग (साँकरी) है कि इसमें ‘अहंकार’ और ‘गुरु’ (या परमात्मा) दोनों एक साथ नहीं रह सकते।
आज यह व्यक्तित्व विकास का सबसे बड़ा सूत्र है। सीखने के लिए Ego को शून्य करना पड़ता है। जब तक आप “मुझे सब पता है” के भाव में रहेंगे, तब तक नया ज्ञान या विकास संभव नहीं है।
जहाँ ‘मैं’ समाप्त, वहीं प्रेम और गुरु प्रकट। प्रेम और ज्ञान वही है जो टिके, गहराई में उतरे और ‘मैं’ को मिटा दे।
132. काल करै सो आज कर आज करै सो अब।
पल में परलय होयगी , बहुरि करेगा कब।
अर्थ: जो काम कल पर टाला है उसे आज कर लो, और जो आज करना है उसे अभी कर लो। समय का कोई भरोसा नहीं है, एक पल में प्रलय आ सकती है या अंत समय आ सकता है, फिर वह अधूरा काम कब पूरा करोगे?
आज यह ‘Procrastination’ के विरुद्ध दुनिया का सबसे प्रसिद्ध सूत्र है। हम अक्सर “कल से पढ़ेंगे” या “कल से कसरत करेंगे” कहते हैं पर कबीर कहते हैं कि ‘Present Moment’ (वर्तमान क्षण) ही एकमात्र सत्य है।इसलिए समय को टालोगे, समय तुम्हें टाल देगा।
133. ऊँचा महल चुनाइया , सुबरन कली ढुलाय।
वे मंदिर खाली पड़ै, रहे मसाना जाय।।
अर्थ: इंसान ने बहुत मेहनत से ऊंचे महल बनवाए और उन्हें सोने (सुबरन) की कलई से सजवाया। लेकिन अंत समय में वे शानदार महल खाली पड़े रह गए और वह इंसान श्मशान (मसाना) में जाकर राख हो गया।
आज यह भौतिकवाद की अंधी दौड़ पर प्रहार है। हम बड़ी गाड़ियाँ और घर बनाने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं, पर कबीर याद दिलाते हैं कि मृत्यु के समय ये ‘संपत्ति’ साथ नहीं जाएगी। असली धन तो वह है जो आपने अपने भीतर कमाया है।
134. पकी खेती देखि के , गरब किया किसान।
अजहूँ झोला बहुत है ,घर आवै तब जान।।
अर्थ: अपनी तैयार फसल को देखकर किसान गर्व (अहंकार) करने लगा कि अब तो लाभ निश्चित है। पर कबीर चेतावनी देते हैं कि अभी बहुत से खतरे (झोला/ओले/आंधी) बाकी हैं; फसल जब सुरक्षित घर आ जाए, तभी उसे अपनी समझना।
आज यह दोहा हमें विनम्रता और सावधानी सिखाता है। सफलता जब तक पूरी तरह प्राप्त न हो जाए, तब तक अहंकार नहीं करना चाहिए क्योंकि जीवन में ‘अनिश्चितता’ कभी भी पासा पलट सकती है इसलिए अंत तक संयम रखो।
135. हाड़ जले लकड़ी जले जले जलावन हार।
कौतिक हारा भी जले , कासों करूँ पुकार।।
अर्थ: श्मशान का दृश्य देखिए—वहाँ शरीर की हड्डियाँ जल रही हैं, लकड़ियाँ जल रही हैं और जो चिता जला रहा था (जलावन हार), एक दिन उसे भी जलना है। यहाँ तक कि जो तमाशा देखने (कौतिक हारा) आए हैं, उनका अंत भी यही है। कबीर कहते हैं, जब सबको ही जलना है, तो मैं किससे दुख की पुकार करूँ?
आज यह दोहा हमें जीवन का सबसे बड़ा सच स्वीकारना सिखाता है। जब हम यह जान लेते हैं कि मृत्यु सबकी होनी है, तो हमारे मन से नफरत, ईर्ष्या और मोह कम होने लगता है। यह हमें समानता का बोध कराता है।जो अभी नहीं जिया,वह कभी नहीं जिया।आज भी मौत के सामने हर पद, हर पहचान समाप्त हो जाती है।
यह दोहा वैराग्य और विवेक जगाता है।
136. मौत बिसारी बावरी , अचरज कीया कौन।
तन माटी में मिल गया , ज्यौं आटा में लौन।।
अर्थ: हे पागल मनुष्य! तूने मौत को भुला दिया है, इसमें तूने कौन सा आश्चर्यजनक काम किया? यह शरीर अंततः मिट्टी में उसी तरह विलीन हो जाएगा, जैसे आटे में नमक (लौन) मिल जाता है और फिर अलग नहीं किया जा सकता।
आज हम अक्सर भौतिक सुखों में इतने अंधे हो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि हमारा अस्तित्व स्थाई नहीं है। जो मृत्यु को याद रखता है, वही जीवन को सही जीता है।यह दोहा हमें विनम्रता और अपरिग्रह सिखाता है कि अहंकार न करें, क्योंकि अंत सबका एक ही है।
गुरु के 5 श्लोक कौन से हैं?
गुरु गोविंद दोऊ खड़े का श्लोक क्या है?
137. गुरु गोविन्द दोउ एक हैं, दूजा सब आकार।
आपा मेटैं हरि भजैं , तब पावैं दीदार।।
अर्थ: गुरु और ईश्वर (गोविन्द) वास्तव में एक ही सत्य के दो रूप हैं, बाकी सब बाहरी दिखावा है। जब मनुष्य अपना ‘आपा’ (अहंकार) मिटाकर भक्ति में लीन होता है, तभी उसे उस परम सत्य के दर्शन (दीदार) होते हैं।
आज यह ‘Ego Dissolution’ का पाठ है। जब तक “मैं” है, तब तक ज्ञान संभव नहीं है। ईश्वर या सत्य तक पहुँचने के लिए स्वयं के अभिमान को त्यागना अनिवार्य है। मैं रहेगा तो ईश्वर नहीं मिलेगा।
138. गुरु गोविन्द दोउ खड़े , काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने , गोविन्द दिया बताय।।
अर्थ: कबीर के सामने एक धर्मसंकट है—गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ खड़े हैं, पहले किसके पैर छुऊं? वे स्वयं ही उत्तर देते हैं कि गुरु ही महान हैं, क्योंकि उन्हीं के दिखाए मार्ग और ज्ञान की वजह से मुझे ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता मिला।
आज यह कृतज्ञता (Gratitude) का सबसे बड़ा उदाहरण है। आपके जीवन में जो शिक्षक या मेंटोर आपको अंधकार से निकाल कर सफलता तक ले गए, उनका सम्मान सर्वोच्च होना चाहिए।
139. गुरु नारायण रूप है ,गुरु ज्ञान को घाट।
सरगुरु बबचान प्रताप सों, मन के मिटे चाट।।
अर्थ: गुरु साक्षात नारायण (परमात्मा) का रूप हैं और वे ज्ञान के उस तट (घाट) के समान हैं जहाँ प्यासा अपनी तृष्णा बुझाता है। सद्गुरु के वचनों के प्रभाव से मन की सारी वासनाएँ और चंचलता (चाट) समाप्त हो जाती है।
आज की सार्थकता: गुरु की शिक्षा केवल डिग्री नहीं है, बल्कि वह आपके चरित्र की सफाई करती है। अच्छे परामर्शदाता के शब्द आपको मानसिक शांति और स्पष्टता (Clarity) प्रदान करते हैं।ज्ञान वही जो मन को शांत करे।
140. गुरु बिन ज्ञान न उपजै , गुरु बिना न मिलै मोक्ष।
गुरु बिन लखै न सत्य को , गुरु बिन मिटै न दोष।।
अर्थ: बिना गुरु के ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती और न ही मुक्ति (मोक्ष) संभव है। गुरु के बिना कोई सत्य को नहीं पहचान सकता और न ही अपने भीतर के विकारों और दोषों को दूर कर सकता है।
आज की सार्थकता: इंटरनेट पर जानकारी की कमी नहीं है, लेकिन ‘विवेक’ (Wisdom) केवल एक अनुभवी गुरु से ही मिलता है। गुरु वह ‘फिल्टर’ है जो हमें जानकारी के ढेर में से काम की बात पहचानना सिखाता है।स्वयं से ऊपर उठे बिना सत्य नहीं मिलता।
जो मृत्यु को भूले, वह भ्रम में है;
जो गुरु को भूले, वह सत्य से दूर है।
141. कबीर सोइ दिन भला , जा दिन साधु मिलाय।
अंक भरे भरि भेटिए, पाप शरीर जाय।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि जीवन का वही दिन वास्तव में सार्थक और शुभ है, जिस दिन किसी सच्चे साधु (सज्जन पुरुष) से मिलन हो। जब हम उनसे पूरे हृदय से (अंक भरि/गले मिलकर) मिलते हैं, तो उनके सकारात्मक प्रभामंडल (Aura) और विचारों के प्रभाव से हमारे मन और शरीर के विकार (पाप) धुल जाते हैं।
कृतज्ञता: “अंक भरि भेटिए” का अर्थ है पूर्ण समर्पण। जब भी कुछ सीखें, पूरे हृदय से और अहंकार छोड़कर सीखें।
आज हम दिन को सफल मानते हैं—काम, धन या मनोरंजन से।
कबीर कहते हैं—जिस दिन कोई आपको भीतर से बेहतर बना दे, वही दिन सार्थक है।
142.दरशन कीजै साधु का, दिन में कई-कई बार।
असोजा का मेल ज्यौं, बहुत करे उपकार।।
अर्थ: साधु के दर्शन और उनके विचारों का श्रवण दिन में जितनी बार संभव हो, उतनी बार करना चाहिए। जैसे ‘असोजा’ (आश्विन मास) की वर्षा और धूप का मेल फसलों के लिए बहुत उपकारी होता है, वैसे ही संतों का बार-बार मिलना हमारे जीवन की ‘चेतना’ को परिपक्व बनाता है।
1. मनोवैज्ञानिक प्रभाव (The Halo Effect):
मनोविज्ञान कहता है कि हम जिन लोगों के साथ रहते हैं, हमारा मस्तिष्क उनकी आदतों और सोच को ‘Mirror’ करने लगता है।सत्संग कभी-कभार नहीं, अभ्यास होना चाहिए। कबीर का “बार-बार दर्शन” का सिद्धांत दरअसल ‘Conditioning’ है। बार-बार अच्छी संगति में जाने से हमारे मस्तिष्क की न्यूरल वायरिंग बदलती है और नकारात्मकता दूर होती है।
143. दोय बखत नहिं करि सके, दिन में करू एक बार।
कबीर साधु दरश ते, उतरे भौजल पार।।
कबीर यहाँ एक लचीला (Flexible) नियम दे रहे हैं। वे जानते हैं कि संसार में लोग व्यस्त हैं। वे कहते हैं: कम समय भी चलेगा, पर मन से जुड़ो।यदि दिन में दो बार सत्संग न कर सको, तो कम से कम एक बार करो।यदि रोज संभव न हो, तो हर दूसरे या तीसरे दिन जाओ। यदि इतना भी न हो सके, तो पखवाड़े (15 दिन) में एक बार तो अनिवार्य रूप से अच्छी संगति में बैठो।
144.दुजें दिन नहिं कर सके, तीजे दिन करू जाय।
कबीर साधु दरश ते , मुझ मुक्ति फल पाय।।
कबीर कहते हैं साधु के दर्शन से मोक्षदायक फल प्राप्त होता है। यदि अगले दिन न हो सके, तो तीसरे दिन अवश्य जाओ।साधु-संग में ढिलाई नहीं, पर निराशा भी नहीं।पुनः प्रयास ही साधना है।आज हम असफल हुए तो छोड़ देते हैं।
कबीर कहते हैं-रुकना मत, लौटकर आओ।
145. बार बार नहिं कर सके , पाख पाख करि लेय।
कहैं कबीर सो भक्त जन,जन्म सुफल करि लेय।।
कबीर कहते हैं जिन्हें साधु दर्शन नित्य न पाते हों , वे पंद्रह दिन में एक बार कर लें ,लेकिन करें अवश्य। इस प्रकार वे अपने जीवन के भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।
वैज्ञानिक पहलू (Information Decay): जैसे मोबाइल को चार्जिंग की जरूरत होती है, वैसे ही मानवीय प्रेरणा (Inspiration) समय के साथ कम होने लगती है। कबीर का “पाख पाख” (15 दिन) का नियम यह सुनिश्चित करता है कि आपकी ‘मानसिक बैटरी’ पूरी तरह डिस्चार्ज होने से पहले फिर से चार्ज हो जाए।
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में नियम कठिन है। कबीर व्यावहारिक समाधान देते हैं– जितना संभव हो, उतना करो पर छोड़ो मत।
146. कहैं कबीर तजि भरम को , नन्हा है कर पीव।
तजि अहं गुरु चरण गहु , जमसों बाचै जीव।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि मन के सारे भ्रमों को त्याग दो और ‘नन्हा’ (छोटा/विनम्र) बनकर ज्ञान रूपी अमृत का पान करो। अपना अहंकार छोड़कर गुरु के चरणों की शरण लो, तभी यह जीव यम (मृत्यु या सांसारिक कष्टों) के भय से बच सकता है।
भावार्थ: ज्ञान प्राप्त करने की पहली शर्त विनम्रता है। जब तक व्यक्ति स्वयं को बड़ा समझता है, वह सीख नहीं सकता। ‘छोटा’ होने का अर्थ है अपने ‘Ego’ को शून्य करना, जिससे गुरु का ज्ञान पूरी तरह आपमें समा सके।
147. अबुध सुबुध सुत मातु , सबहिं करै प्रतिपाल।
अपनी और निबाहिए, सिख सुत गहीन निज चाल।
अर्थ: जैसे एक माता अपने पुत्र का पालन-पोषण करती है, चाहे वह पुत्र बुद्धिमान (सुबुध) हो या मूर्ख (अबुध), वैसे ही गुरु अपने हर प्रकार के शिष्य का प्रतिपाल करते हैं। गुरु अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाते हैं, भले ही शिष्य या पुत्र अपनी टेढ़ी चाल (गलत मार्ग) ही क्यों न चलता रहे।
भावार्थ: यह दोहा गुरु के निस्वार्थ प्रेम और धैर्य को दर्शाता है। गुरु केवल योग्य को ही नहीं सिखाते, बल्कि अज्ञानी को भी अपनी छत्रछाया में रखते हैं। यह शिष्य के लिए चेतावनी भी है कि वह गुरु की करुणा का लाभ उठाकर सही मार्ग पर लौट आए।
148. सुनिए संतों साधु मिलि, कहहिं कबीर बुझाय।
जेहि विधि गुरु सों प्रीति है , कीजै सोई उपाय।।
अर्थ: कबीर संतों और साधुओं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मैं यह बात समझाकर कह रहा हूँ—जिस भी तरीके से गुरु के प्रति तुम्हारा प्रेम और श्रद्धा बढ़े, वही उपाय करना चाहिए।
भावार्थ: यहाँ भक्ति और ज्ञान के ‘तरीके’ से ज्यादा ‘भाव’ को महत्व दिया गया है। यदि कर्मकांडों से प्रेम नहीं बढ़ रहा, तो उन्हें छोड़कर उस सरल मार्ग को अपनाओ जिससे गुरु (ज्ञान) के प्रति अटूट लगाव पैदा हो।
149. सतगुरु महिमा अनंत है , अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघारिया , अनंत दिखावन हार।।
सतगुरु की महिमा और उपकार अनंत हैं। वे ही हमारे नेत्रों में इतनी दूरदृष्टि भर देते हैं कि हमें ईश्वर के दर्शन हो जाते हैं।
🔹 अर्थ
सच्चे गुरु की महिमा अनंत है।
उन्होंने अनगिनत उपकार किए—
अज्ञान की आँखें खोल दीं
और अनंत सत्य का दर्शन करा दिया।
अर्थ: सद्गुरु की महिमा का कोई अंत नहीं है और उन्होंने मुझ पर अनगिनत उपकार किए हैं। उन्होंने मेरी वे ‘अनंत आँखें’ (दिव्य दृष्टि/Third Eye) खोल दी हैं, जिससे मैं उस ‘अनंत’ (परमात्मा/सत्य) को देख पा रहा हूँ।
भावार्थ- गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, वे दृष्टि बदल देते हैं- दुनिया को देखने का तरीका।इस दृष्टि के मिलने के बाद मनुष्य को सत्य और असत्य के बीच का अंतर दिखने लगता है। यह गुरु का सबसे बड़ा उपहार है।
150. सतगुरु मेरा शूरमा, तकि तकि मारै तीर।
लागे पन भागे नहीं , ऐसा दास कबीर।।
अर्थ: मेरे सद्गुरु एक महान योद्धा (शूरमा) हैं, जो चुन-चुनकर (लक्ष्य साधकर) ज्ञान के तीर मारते हैं। कबीर कहते हैं कि जब वह तीर (ज्ञान की बात) एक बार लग जाता है, तो शिष्य का मन फिर यहाँ-वहाँ नहीं भटकता (भागता नहीं), वह सत्य में ही टिक जाता है।
भावार्थ: गुरु के शब्द ‘तीर’ की तरह तीखे होते हैं जो हमारे अज्ञान और भ्रम को छेद देते हैं। एक सच्चा शिष्य वह है जो गुरु की ‘चोट’ (डांट या कठिन शिक्षा) को सह ले और उससे विचलित होकर भागे नहीं, बल्कि अपने सुधार के लिए अडिग रहे।जो गुरु के चरण में झुक गया,वह संसार के भय से उठ खड़ा हुआ।गुरु का ज्ञान एक बार हृदय में उतर जाए, तो शिष्य संसार के डर, लोभ और भ्रम से डगमगाता नहीं।
151. गुरवा तो सस्ता भया , पैसा केर पचास।
राम नाम धन बेचि के , शिष्य करन की आस।
सस्ते और पैसों में बिकनेवाले गुरु गली गली में मिलते हैं , जो राम नाम का धन पैसों में बेचते फिरते हैं। ऐसे झूठे गुरु से बचना चाहिए। क्योंकि ये यथार्थ ज्ञान से कोसों दूर रहते हैं।
कबीर यहाँ ढोंगी और व्यापारी गुरु पर प्रहार करते हैं। जो गुरु धर्म और नाम को कमाई का साधन बना ले, वह शिष्य नहीं, ग्राहक बनाता है।
152. भेदी लीया साथ करि , दीन्हा वास्तु लखाय।
कोटि जनम का पंथ था , पल में पहुंचा जाय।
अर्थ: जब मैंने उस ‘भेदी’ (रहस्यों को जानने वाले सच्चे गुरु) का साथ पकड़ लिया, तो उन्होंने मुझे उस वास्तविक ‘वस्तु’ (परमात्मा/सत्य) का साक्षात्कार करा दिया। जिस लक्ष्य तक पहुँचने में करोड़ों जन्म लग सकते थे, गुरु के मार्गदर्शन से मैं वहाँ एक पल में पहुँच गया।
भावार्थ: यह ‘Efficiency’ (कार्यकुशलता) का अध्यात्म है। बिना नक्शे के भटकने से करोड़ों साल लग सकते हैं, लेकिन अनुभवी गुरु (भेदी) हमें ‘शॉर्टकट’ यानी सीधा और सही रास्ता दिखा देता है।सच्चा गुरु तत्वज्ञान एक पल में दे देता है।जब शिष्य पात्र होता है, तो जन्म-जन्म का अंधकार एक क्षण में मिट जाता है।
153. कहता हूँ कहि जात हूँ , देता हूँ हेला।
गुरु की करनी गुरु जाने , चेला की चेला।।
अर्थ: कबीर पुकार-पुकार कर (हेला देकर) कह रहे हैं कि अंततः हर किसी को अपने कर्मों का फल स्वयं भोगना होगा। गुरु अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी है और चेला अपने कर्मों के लिए।
भावार्थ: कोई भी गुरु किसी शिष्य का पाप नहीं ढो सकता और न ही शिष्य गुरु के पुण्य से तर सकता है। हर व्यक्ति को अपनी साधना और ईमानदारी स्वयं निभानी होगी। कबीर बताते हैं कि उपदेश देना आसान है, निभाना कठिन।हर व्यक्ति अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है। यह व्यक्तिगत जवाबदेही का पाठ है।
154. बंधे को बंधा मिला , छूटे कौन उपाय।
कर सेवा निरबंध की , पल में लेट छुड़ाय।।
अर्थ: यदि एक बंधन में पड़ा व्यक्ति (अज्ञानी) दूसरे बंधन में पड़े व्यक्ति को गुरु बना ले, तो दोनों की मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। सेवा उसकी करनी चाहिए जो स्वयं ‘निरबंध’ (मोह-माया से मुक्त) हो, वही आपको एक पल में बंधनों से छुड़ा सकता है।
भावार्थ: “अंधा अंधे को रास्ता नहीं दिखा सकता।” यदि आपका मेंटर खुद लालच और विकारों में फँसा है, तो वह आपका मार्गदर्शन क्या करेगा? इसलिए हमेशा ऐसे व्यक्ति का अनुसरण करें जो मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र हो।
155. ऐसा कोई ना मिला, हमको दे उपदेश।
भवसागर में डूबते , कर गहि काढ़े केश।।
कबीर की यह पंक्ति गहरी पीड़ा और सच्चे गुरु की खोज को दर्शाती है।
अर्थ: कबीर बड़े दुख के साथ कहते हैं कि मुझे ऐसा कोई समर्थ पुरुष नहीं मिला जो मुझे ऐसा (सत्य का) उपदेश दे, जो मुझे इस संसार रूपी सागर में डूबने से बचा ले और मेरे बाल (केश) पकड़कर मुझे बाहर खींच ले।
भावार्थ: यहाँ गुरु को एक ‘Life Guard’ की तरह दिखाया गया है। कबीर कहते हैं – सच्चा गुरु वही है जो संकट में केवल बोलता नहीं, बल्कि जीवन को उबार ले।उस गुरु की महिमा गा रहे हैं जो आपको गिरने नहीं देता, बल्कि जबरदस्ती आपके विकारों से आपको खींचकर बाहर निकाल लाता है। यह गुरु की रक्षात्मक शक्ति का वर्णन है।जो खुद बंधन में है, वह क्या छुड़ाएगा? जो मुक्त है, वही मुक्त करेगा।
156. कबीर नवै सो आपको , पर को नवै न कोय।
घालि तराजू तौलिए , नवै सो भारी होय।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति झुकता है, तो वह अपने स्वयं के कल्याण के लिए झुकता है, दूसरों पर कोई अहसान नहीं करता। ठीक वैसे ही जैसे तराजू के पलड़े में जो हिस्सा भारी होता है, वही नीचे की ओर झुकता है।
भावार्थ: झुकना (विनम्रता) कमजोरी की नहीं, बल्कि चरित्र की गहराई और वजन की निशानी है। जिसके पास ज्ञान और गुणों का भंडार होता है, वह फलदार वृक्ष की तरह झुक जाता है। ओछा व्यक्ति ही अकड़ कर चलता है।
157. नीचै नीचै सब तिरै , संत चरण लौ लीन।
जातिहि के अभिमान ते , बूड़े सकल कुलीन।।
अर्थ: जो स्वयं को छोटा मानकर संतों के चरणों में लीन रहते हैं और विनम्र बने रहते हैं, वे इस संसार सागर को पार कर जाते हैं (तिर जाते हैं)। इसके विपरीत, जो अपनी ऊँची जाति या कुल के अहंकार में अकड़े रहते हैं, वे उस बोझ से जीवन के बीच में ही डूब जाते हैं।
भावार्थ: अध्यात्म में आपकी ‘डिग्री’ या ‘खानदान’ मायने नहीं रखता। मोक्ष और ज्ञान केवल उसे मिलता है जो सरल है। अहंकार एक पत्थर की तरह है जो मनुष्य को डुबो देता है।
158. कबीर सबते हम बुरे ,हमते भल सब कोय।
जिन ऐसा कर बूझिया , मीत हमारा सोय।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि मैं सबसे बुरा हूँ और मुझसे अच्छे बाकी सभी लोग हैं। जिस व्यक्ति ने इस बात को गहराई से समझ लिया और अपने भीतर के विकारों को पहचान लिया, वही वास्तव में मेरा सच्चा मित्र है।
भावार्थ: यह Self-Awareness की पराकाष्ठा है। जब हम दूसरों में बुराई देखना छोड़कर अपनी कमियों पर ध्यान देते हैं, तब हमारे भीतर सुधार की प्रक्रिया शुरू होती है। जो व्यक्ति खुद को ‘परफेक्ट’ मानता है, उसके सीखने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं।यह अहंकार-विसर्जन की चरम अवस्था है।जब व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ मानना छोड़ देता है, तभी उसके भीतर करुणा, प्रेम और मित्रता जन्म लेती है। ऐसा व्यक्ति किसी से द्वेष नहीं करता।
159. मिसरी बिखरी रेत में , हस्ती चुनी न जाय।
कीड़ी है करि सब चुनै , तब साहिब कूँ पाय।।
अर्थ: यदि रेत में चीनी (मिसरी) के दाने गिर जाएं, तो एक विशाल हाथी (हस्ती) अपनी ताकत और बड़े शरीर के बावजूद उन्हें नहीं चुन सकता। लेकिन एक नन्हीं चींटी (कीड़ी) बनकर उन दानों को आसानी से बीन लिया जाता है। उसी प्रकार, जो चींटी जैसा छोटा (अहंकार रहित) बनता है, वही ईश्वर (साहिब) को प्राप्त कर पाता है।
भावार्थ: जीवन के सूक्ष्म सत्य और ईश्वर का आनंद ‘अहंकार के हाथी’ बनकर नहीं पाया जा सकता। इसके लिए सूक्ष्मता, धैर्य और विनम्रता की आवश्यकता होती है। बड़ा बनकर आप भीड़ देख सकते हैं, लेकिन छोटा बनकर ही आप ‘सत्य’ के करीब पहुँच सकते हैं।जो झुक गया, वही उठ गया; जो अकड़ा, वही डूब गया।
160. लगी लगी क्या करै, लगत रही लगार।
लागि तभी जानिए , निकसि जाय दुसार।।
‘लग गई, लग गई’ सब कहते हैं, लेकिन जीवन में ऐसी न जाने कितनी ठोकरें लगती रहती हैं लेकिन असली ठोकर उसे ही जानिए , जिससे मन और शरीर के सारे विकार निकल जाएँ। अर्थात सदगुरु के ज्ञान की ठोकर खाएँ , जिससे जीवन निर्मल हो जाए।
यह दोहा कथनी और करनी के अंतर को स्पष्ट करता है। अक्सर लोग कहते हैं कि उन्होंने बहुत ज्ञान प्राप्त कर लिया है, लेकिन उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं दिखता। कबीर के अनुसार, सच्चा ज्ञान वह है जो आपके पुराने व्यक्तित्व को नष्ट कर दे और आर-पार निकलकर आपको एक नया स्वरूप दे दे।
161.हरिजन सोई जानिए , जिह्वा कहैं न मार।
आठ पहर चितवन रहै , गुरु का ज्ञान विचार।।
अर्थ: ‘हरिजन’ (ईश्वर का बंदा या सच्चा साधक) उसे समझना चाहिए जिसकी जीभ कभी ‘मार-काट’ या कड़वे शब्द नहीं बोलती (अर्थात जो पूर्णतः अहिंसक और मृदुभाषी है)। वह व्यक्ति आठों पहर (24 घंटे) अपने चित्त में केवल गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान और सत्य का ही चिंतन-मनन करता रहता है।जो गुरु के ज्ञान को जीवन में उतार ले, वही वास्तविक अर्थ में हरिजन है।
भावार्थ: यहाँ कबीर ने दो मुख्य मापदंड दिए हैं:
- संयम (Self-Control): वाणी पर नियंत्रण। जो दूसरों को शब्दों से दुखी नहीं करता, वही आध्यात्मिक है।
- एकाग्रता (Focus): सच्चा साधक वह नहीं जो केवल सुबह-शाम पूजा करे, बल्कि वह है जिसका मन हर समय अपने लक्ष्य और ज्ञान के विचार में डूबा रहे।
जिसकी लगन से द्वैत मिटे और वाणी से किसी को चोट न पहुँचे- वही कबीर की दृष्टि में सच्चा भक्त है।
162. कुटिल वचन सबसे बुरा , जारी करै सब छार।
साधु वचन जल रूप है , बरसै अमृत धार।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि कड़वे और कठोर (कुटिल) शब्द दुनिया में सबसे बुरे हैं, क्योंकि वे सुनने वाले के हृदय को जलाकर भस्म (छार) कर देते हैं। इसके विपरीत, सज्जनों (साधु) की वाणी शीतल जल के समान होती है, जो चारों ओर शांति की अमृत धार बरसाती है।
भावार्थ: वाणी में वह शक्ति है जो युद्ध भी करा सकती है और शांति भी। कड़वा शब्द अग्नि की तरह रिश्तों और मानसिक शांति को जला देता है, जबकि मधुर शब्द मरहम की तरह घावों को भर देते हैं।
आज के संदर्भ में- एक ट्वीट, एक टिप्पणी या एक ताना या तो जीवन बना सकता है, या बिगाड़ सकता है।
163. कुटिल वचन नहिं बोलिए , शीतल बैन ले चीन्हि।
गंगाजल शीतल भया , परबत फोड़ा तीन्हि।।
अर्थ: हमें कभी भी कड़वे वचन नहीं बोलने चाहिए, बल्कि हमेशा शीतल और मधुर वाणी (बैन) का चुनाव करना चाहिए। देखो, गंगा का जल स्वभाव से कितना शीतल है, लेकिन अपनी निरंतरता और कोमलता के बल पर उसने कठोर पर्वतों को भी चीर दिया है।वैसे ही शीतल वाणी बिना लड़ाई के अहंकार और कठोरता को तोड़ देती है
भावार्थ: यह दोहा एक महान सत्य सिखाता है—”कोमलता में कठोरता से अधिक शक्ति होती है।” विनम्रता और मधुर वाणी से आप वे काम करवा सकते हैं जो क्रोध और कठोरता से कभी नहीं हो सकते।
164. ज्यौं कोरी रेजा बुनै, नीरा आवै छोर।
ऐसा लेखा मीच का, दौरि सके तो दौर।।
अर्थ: जिस प्रकार एक जुलाहा (कोरी) कपड़ा बुनता है और धीरे-धीरे धागा खत्म होने की ओर (छोर) बढ़ता जाता है, ठीक वैसे ही हमारी उम्र का धागा भी हर पल बुना जा रहा है और मौत (मीच) के करीब पहुँच रहा है। यदि तुझे कुछ सार्थक करना है, तो समय रहते दौड़ ले (प्रयास कर ले)।
भावार्थ: यहाँ कबीर ‘Procrastination’ (टालमटोल) के विरुद्ध चेतावनी दे रहे हैं। जीवन की सांसें सीमित हैं। मृत्यु निरंतर हमारी ओर बढ़ रही है, इसलिए समय रहते
कर्म और चेतना को शुद्ध कर लो , नेक काम या आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में देरी नहीं करनी चाहिए।यह डराने का नहीं, जाग्रत करने का संदेश है।
165. मैं मेरी तू जनि करै , मेरी मूल विनासि।
मेरी गल का पैखड़ा , मेरी गाल की फ़ांसि।।
अर्थ: कबीर समझाते हैं कि “यह मेरा है, वह मेरा है” का राग मत अलाप, क्योंकि यह ‘मेरा’ (ममत्व) ही सारे दुखों और विनाश की जड़ (मूल) है। यह ‘मेरी’ शब्द गले की बेड़ी (पैखड़ा) और मौत की फांसी के समान है जो जीव को संसार के चक्र में बांधे रखती है।
भावार्थ: मनुष्य वस्तुओं और व्यक्तियों के साथ जो “अत्यधिक मोह” जोड़ लेता है, वही उसकी मानसिक गुलामी का कारण बनता है। जब तक “मैं” है,
तब तक ईश्वर, गुरु और सत्य से दूरी है।जब तक हम ‘मेरा-तेरा’ के चक्कर में फंसे हैं, तब तक हम वास्तविक स्वतंत्रता (मुक्ति) का अनुभव नहीं कर सकते।
166. नान्हा कातौ चित्त दे, महँगे मोल बिकाय।
ग्राहक राजा राम है , और न नीरा जाय।।
अर्थ: कबीर (जो स्वयं जुलाहे थे) सूत कातने के प्रतीक से कहते हैं कि अपने कर्मों का सूत बहुत ‘नान्हा’ (बारीक और सुंदर) और एकाग्र चित्त होकर कातो, तो वह बहुत महँगे मोल बिकेगा। याद रखो, इस कर्म का असली ग्राहक स्वयं ‘राम’ (ईश्वर) है, और उनके यहाँ कोई भी अच्छी चीज़ अनसुनी या बेकार नहीं जाती।
भावार्थ: यह ‘Excellence’ (उत्कृष्टता) का सूत्र है। आप जो भी काम करें (चाहे वह नौकरी हो, कला हो या भक्ति), उसे इतनी बारीकी और ईमानदारी से करें कि वह परमात्मा की कसौटी पर खरा उतरे। ईश्वर केवल दिखावा नहीं, आपकी नीयत की गहराई देखते हैं।
167. तन सराय मन पाहरू , मनसा उतरी आय।
को काहु का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय।।
अर्थ: यह शरीर एक ‘सराय’ (होटल या विश्राम गृह) के समान है, जहाँ ‘मन’ एक पहरेदार या यात्री है और हमारी इच्छाएँ (मनसा) इसमें कुछ देर के लिए आकर ठहरती हैं। कबीर कहते हैं कि मैंने जीवन को हर तरह से ‘ठोंक-बजाकर’ (अच्छी तरह परखकर) देख लिया है, यहाँ अंततः कोई किसी का स्थाई साथी नहीं है।
भावार्थ: यह दोहा हमें अनासक्ति (Detachment) सिखाता है। हम इस संसार में मुसाफिर हैं। लोगों और वस्तुओं से अत्यधिक मोह न पालें, क्योंकि सराय में मिलने वाले यात्री अंत में बिछड़ ही जाते हैं।
कबीर कहते हैं- जो इसे समझ लेता है, वह मोह और भय से मुक्त हो जाता है।
168. जो है जाका भावता, जब-तब मिलिहैं आय।
तन मन ताको सौंपिए, जो कबहुँ न छाँड़ि जाय।।
अर्थ: जो जिसके मन को भाता है (प्रिय लगता है), वह कभी न कभी उसे मिल ही जाता है। लेकिन कबीर सलाह देते हैं कि अपना तन और मन उसे सौंपना चाहिए (उससे प्रेम करना चाहिए), जो कभी साथ छोड़कर न जाए—अर्थात वह अविनाशी परमात्मा।
भावार्थ: सांसारिक लोग और वस्तुएँ आज हैं, कल नहीं। इसलिए अपना पूर्ण समर्पण किसी नश्वर चीज़ को देने के बजाय उस शाश्वत सत्य (ईश्वर/ज्ञान) को दें जो हर स्थिति में आपके साथ रहे।
169. जल में बसे कुमोदिनी , चंदा बसे अकास।
जो है जाका भावता , सो ताही के पास।।
अर्थ: कुमुदिनी (कमलिनी) जल में खिलती है और चंद्रमा करोड़ों मील दूर आकाश में रहता है। फिर भी चंद्रमा को देखकर कुमुदिनी खिल उठती है। कबीर कहते हैं कि जो जिसे प्रिय लगता है, वह भौतिक रूप से चाहे कितनी ही दूर क्यों न हो, वह वास्तव में उसी के पास (हृदय में) होता है।
भावार्थ: यह ‘Emotional Connection’ का अद्भुत उदाहरण है। प्रेम में दूरी मायने नहीं रखती। यदि आपके विचार और भाव किसी ऊंचे लक्ष्य या व्यक्ति से जुड़े हैं, तो आप सदैव उनके सानिध्य में हैं।
170. आगि आँचि सहना सुगम, सुगम खड़ग की धार।
नेह निबाहन एक रस , महा कठिन ब्यौहार।।
अर्थ: आग की लपटों को सहना आसान है और तलवार की धार पर चलना भी सुगम हो सकता है, लेकिन प्रेम (नेह) को जीवन भर ‘एक रस’ (बिना बदले, उसी गहराई के साथ) निभाना दुनिया का सबसे कठिन व्यवहार है।क्योंकि समय के साथ साथ इसका रूप परिवर्तित होता रहता है।
भावार्थ: शुरुआत करना आसान है, पर Consistency (निरंतरता) कठिन है। चाहे वह ईश्वर से प्रेम हो या आदर्शों से, समय के साथ फीका न पड़ना ही असली परीक्षा है।
171.प्रीति पुरानि न होत है , जो उत्तम से लाग।
सवो बरसाँ जल में रहै , पत्थर न छोड़े आग।.
अर्थ: यदि प्रेम किसी उत्तम (श्रेष्ठ) व्यक्ति या आदर्श से हो जाए, तो वह कभी पुराना (कमजोर) नहीं होता। कबीर उदाहरण देते हैं कि चकमक पत्थर चाहे सौ वर्षों तक जल के भीतर पड़ा रहे, लेकिन उसके भीतर की अग्नि (चिंगारी उत्पन्न करने की क्षमता) समाप्त नहीं होती। जैसे ही उसे रगड़ा जाता है, वह पुनः आग प्रकट कर देता है।
भावार्थ: यह ‘Core Values’ (मूल मूल्यों) की बात है। यदि आपके संस्कार और आपके संबंध गहरे और सत्य पर आधारित हैं, तो परिस्थितियाँ (जल) उन्हें मिटा नहीं सकतीं। कठिन समय में भी उत्तम व्यक्ति अपना स्वभाव और अपनी निष्ठा नहीं छोड़ता।
ऐतिहासिक स्रोत: इतिहास में ऐसे ‘पत्थर’ जैसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने वर्षों के संघर्ष (जल) के बाद भी अपनी ‘आग’ नहीं छोड़ी। जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज या महाराणा प्रताप—इनका अपनी मातृभूमि से ‘प्रीति’ (प्रेम) कभी पुराना नहीं हुआ।
वैज्ञानिक संदर्भ: पत्थर में आग की बात वैज्ञानिक रूप से ऊर्जा के संरक्षण (Potential Energy) को दर्शाती है। यह सिखाता है कि बाह्य वातावरण हमारे आंतरिक गुणों को तब तक नहीं बदल सकता जब तक हम स्वयं उसे अनुमति न दें।
धैर्य (Resilience): पत्थर के उदाहरण से सीखें कि संकटों के बीच रहने पर भी अपने भीतर के उत्साह और जुनून (आग) को मरने न दें
172. सब वन तो चन्दन नहीं , शूरा के दल नाहिं।
सब समुद्र मोती नहीं , यों साधु जग माहिं।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि हर जंगल में चंदन के वृक्ष नहीं पाए जाते, हर समूह में सच्चे शूरवीर (साहसी योद्धा) नहीं होते और न ही हर समुद्र में मोती मिलते हैं। ठीक उसी प्रकार, इस संसार में साधु (सज्जन और ज्ञानी पुरुष) भी हर जगह नहीं मिलते; वे अत्यंत दुर्लभ होते हैं।
भावार्थ: यह दोहा हमें ‘Quality over Quantity’ (संख्या के बजाय गुणवत्ता) का पाठ पढ़ाता है। भीड़ हमेशा सत्य या श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं होती। श्रेष्ठ विचार और श्रेष्ठ व्यक्ति विरल होते हैं, इसलिए जब भी वे मिलें, उनका सम्मान और सानिध्य सहेज कर रखना चाहिए।
सामाजिक प्रभाव: “सब वन तो चन्दन नहीं” आज के ‘Content’ और ‘Information’ के युग में बहुत सटीक है। इंटरनेट पर सूचनाओं का जंगल है, पर ‘चंदन’ जैसा ज्ञान दुर्लभ है। यह हमें ‘Critical Thinking’ सिखाता है कि हम भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय ‘मोती’ और ‘साधु’ की पहचान करना सीखें।
चयन (Selection): अपने दोस्तों और मेंटर्स का चुनाव करते समय याद रखें कि ‘मोती’ हर जगह नहीं मिलते। भीड़ का पीछा छोड़कर गुणवत्ता (Quality) की तलाश करें।
संबंधों की गहराई: यदि आप किसी अच्छे काम या इंसान से जुड़े हैं, तो समय के साथ उसे ‘पुराना’ न होने दें; उसे ‘उत्तम’ श्रेणी में बनाए रखें।
173. कबीर हमारा कोई नहिं ,हम काहू के नाहिं।
पारै पहुंची नाव ज्यौं , मिलिके बिछुरी जाहिं।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि इस संसार में न कोई मेरा अपना है और न मैं किसी का हूँ। यह मेल ठीक वैसा ही है जैसे एक नाव जब नदी के पार पहुँचती है, तो उस पर बैठे यात्री उतरकर अपनी-अपनी दिशा में चले जाते हैं।
भावार्थ: यह दोहा हमें अनासक्ति (Non-attachment) सिखाता है। संसार के रिश्ते एक यात्रा के साथी की तरह हैं। जैसे ही जीवन की यात्रा का पड़ाव आता है, सबको बिछड़ना ही पड़ता है। इसलिए रिश्तों में इतना मोह न पालें कि आप अपना आध्यात्मिक लक्ष्य भूल जाएं।
174. कबीर गुरु की भक्ति बिनु , राजा रासभ होय।
माटी लदै कुम्हार की , घास न डारै कोय।।
कबीर कहते हैं कि गुरु की भक्ति के बिना राजा भी मरकर गधे की योनि में जन्म लेता है। उसे बोझ ढोना पड़ता है और भरपेट घास भी नहीं मिलती।
अर्थ: गुरु के ज्ञान और भक्ति के बिना एक प्रतापी राजा का अगला जन्म ‘रासभ’ (गधा) का हो सकता है। उसे कुम्हार की मिट्टी ढोनी पड़ेगी और कोई उसे सूखी घास तक नहीं पूछेगा।
भावार्थ: यहाँ कबीर ज्ञान और अहंकार के अंतर को स्पष्ट कर रहे हैं। बिना विवेक और गुरु के मार्गदर्शन के, सत्ता और धन व्यक्ति को अहंकारी और अंधा बना देते हैं, जो अंततः उसके पतन का कारण बनता है। असली धन केवल ‘ज्ञान’ है।
175. कबीर हृदय कठोर के, शब्द न लागै सार।
सुधि बुधि के हिरदै विधे , उपजे ज्ञान विचार।।
अर्थ: जिसका हृदय पत्थर के समान कठोर (अहंकारी) है, उस पर गुरु के ज्ञान के श्रेष्ठ शब्दों का कोई असर नहीं होता। लेकिन जिसका चित्त सुध-बुध वाला और कोमल है, उसके हृदय में गुरु के शब्द तीर की तरह बिंध जाते हैं और वहीं से सच्चे ज्ञान और विचारों का जन्म होता है।
भावार्थ: सीखने के लिए पात्रता (Receptivity) जरूरी है। यदि आप पहले से ही धारणाओं से भरे और कठोर हैं, तो ज्ञान आपमें प्रवेश नहीं कर पाएगा। कोमलता ही विकास की उर्वर भूमि है।
176. गुरु की आज्ञा आवई, गुरु की आज्ञा जाय।
कहैं कबीर सो संत है , आवागमन नसाय।।
यहाँ गुरु की आज्ञा का अर्थ है—नियम और अनुशासन। जब मनुष्य अपनी चंचल इच्छाओं के बजाय एक उच्च मार्गदर्शक के सिद्धांतों पर चलता है, तो उसका जीवन भटकन से बच जाता है और वह परम शांति प्राप्त करता है।
कबीरदास जी कहते हैं कि जो शिष्य समर्पित भाव से गुरु की प्रत्येक आज्ञा का पालन करता है। वह आवागमन के चक्र से छूटकर मोक्ष पा लेता है। अर्थ: जो साधक गुरु की आज्ञा के अनुसार ही संसार में आता है और उनकी आज्ञा (नियमों) के अनुसार ही अपना जीवन चलाता है, वही सच्चा संत है। ऐसा व्यक्ति जन्म-मरण (आवागमन) के चक्र से मुक्त हो जाता है।
भावार्थ: यहाँ गुरु की आज्ञा का अर्थ है—नियम और अनुशासन। जब मनुष्य अपनी चंचल इच्छाओं के बजाय एक उच्च मार्गदर्शक के सिद्धांतों पर चलता है, तो उसका जीवन भटकन से बच जाता है और वह परम शांति प्राप्त करता है।
177. जब तू आया जगत में , लोग हँसे तू रोय।
ऐसी करनी ना करो ,पीछे हँसे सब कोय।।
अर्थ: जब तुमने इस संसार में जन्म लिया था, तब लोग खुश थे (हँसे थे) और तुम रो रहे थे। लेकिन कबीर चेतावनी देते हैं कि जीवन में ऐसे कर्म मत करना कि जब तुम यहाँ से जाओ, तब लोग तुम्हारी बुराई पर हँसें। इसके बजाय, ऐसा जीवन जियो कि तुम्हारी विदाई पर दुनिया रोए और तुम हँसते हुए जाओ।
भावार्थ: यह ‘Legacy’ (विरासत) का दोहा है। मनुष्य का जन्म केवल खाने-पीने के लिए नहीं है। हमें अपने पीछे ऐसे कर्म छोड़कर जाने चाहिए जो समाज का भला करें।
178. कैसा भी सामर्थ्य हो , बिन उद्यम दुःख पाय।
निकट आसान बिन कर चले , कैसे मुख में जाय।।
अर्थ: आपके पास कितनी भी योग्यता या शक्ति (सामर्थ्य) क्यों न हो, बिना परिश्रम (उद्यम) के आप दुखी ही रहेंगे। जैसे भोजन थाली में आपके सामने रखा हो, पर बिना हाथ हिलाए वह खुद आपके मुँह में नहीं जा सकता।
आज का संदर्भ: यह ‘Execution’ का मंत्र है। आज के युवाओं के पास डिग्रियाँ और ‘स्किल’ (सामर्थ्य) तो है, पर कई बार वे आलस्य या ‘ओवरथिंकिंग’ के कारण कदम नहीं उठाते। कबीर कहते हैं कि केवल “पोटेंशियल” होने से पेट नहीं भरता, परिणाम के लिए हाथ-पैर हिलाने ही पड़ेंगे।
179. श्रम ही ते सब होत है , जो मन राखे धीर।
श्रम ते खोदत कूप ज्यों , थल में प्रगटै नीर।।
अर्थ: यदि मन में धैर्य (धीर) हो, तो मेहनत से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। जिस प्रकार कठोर सूखी जमीन को खोदते रहने के श्रम से अंततः मीठा जल (नीर) प्रकट हो जाता है, वैसे ही निरंतर प्रयास से असंभव कार्य भी संभव होते हैं।
आज का संदर्भ: यह ‘Startup’ और ‘Career’ की दुनिया के लिए सबसे बड़ा सबक है। लोग 2 महीने में सफलता चाहते हैं, पर कबीर ‘कुआँ खोदने’ जैसे धैर्य की बात करते हैं। सफलता रातों-रात नहीं मिलती, वह निरंतर मेहनत की गहराई में छिपी होती है।
180. साँचे कोई न पतियाय , झूठे जग पतियाय।
गली गली गोरस फिरै , मदिरा बैठ बिकाय।।
अर्थ: इस संसार में सच बोलने वाले पर कोई विश्वास नहीं करता, जबकि झूठ आग की तरह शहर में फ़ैल जाता जाता है।झूठ पर सब भरोसा कर लेते हैं। देखो, अमृत जैसा दूध (गोरस) गली-गली घूमकर बेचना पड़ता है, पर जहर जैसी शराब (मदिरा) एक जगह बैठकर भी धड़ल्ले से बिकती है।
आज का संदर्भ: यह ‘Fake News’ और ‘Misleading Marketing’ का सटीक चित्रण है। आज अच्छी और सेहतमंद चीजें बेचने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जबकि नुकसानदायक चीजें और भ्रामक खबरें (Clickbait) जंगल की आग की तरह फैलती हैं। समाज का स्वभाव आज भी दिखावे और नशे (भ्रम) के प्रति ज्यादा आकर्षित है।
181.आए हैं ते जाएंगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर।।
अर्थात संसार में जो भी आया है, उसे एक न एक दिन जाना है, चाहे वह राजा हो या रंक, इसमें जो सत्कर्म करता है वह सिंहासन पर सवार होकर जाता है और जो बुरे कर्म करता है, वह नरक की बेड़ियों में जकड़ कर ले जाया जाता है।
मृत्यु सबके लिए समान है, पर कर्म का परिणाम अलग-अलग होता है।
आज का संदेश- सत्ता स्थायी नहीं ,पद अस्थायी है, केवल कर्म और चरित्र साथ जाते हैं
182. दीन गंवायो दूनी संग, दूनी न चाली साथ।
पाव कुल्हाड़ी मारिया, मूरख अपने हाथ।।
तूने अपना अमूल्य समय दुनिया के साथ गंवा दिया। अंत समय में उसने भी तेरा साथ छोड़ दिया। कैसी मूर्खता की? खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।
अर्थ: मनुष्य ने दुनियादारी (दूनी) और भौतिक सुखों के पीछे पड़कर अपना धर्म और आत्मिक शांति (दीन) खो दी। अंत में यह दुनिया साथ नहीं चली और उस मूर्ख ने अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।
आज का संदर्भ: यह ‘Work-Life Balance’ और ‘Mental Health’ का सबसे बड़ा उदाहरण है। हम पैसा कमाने और दूसरों को प्रभावित करने (दूनी) के चक्कर में अपनी शांति, स्वास्थ्य और रिश्तों (दीन) को दांव पर लगा देते हैं। अंत में न वह पैसा साथ जाता है, न वे लोग। यह अपनी खुशियों की खुद ही हत्या करने जैसा है।
मेहनत छोड़कर सामर्थ्य पर भरोसा, सत्य छोड़कर प्रचार पर भरोसा, और मूल्यों छोड़कर धन पर भरोसा- तीनों ही अंततः दुख देते हैं।
183. भय बिन भाव न उपजै, भय बिनु होय न प्रीति।
जब हिरदे से भय गया, मिटी सकल रस रीति।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि बिना ‘भय’ (यहाँ भय का अर्थ मर्यादा या अनुशासन से है) के हृदय में श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, और बिना श्रद्धा के सच्चा प्रेम (प्रीति) नहीं हो सकता। यदि मन से मर्यादा का यह डर निकल जाए, तो जीवन के सारे आदर्श और रस समाप्त हो जाते हैं।
आज का संदर्भ: यहाँ कबीर डराने की बात नहीं, बल्कि ‘Accountability’ (जवाबदेही) की बात कर रहे हैं। आज के समाज में यदि कानून का डर न हो, तो नागरिक व्यवस्था बिगड़ जाएगी; यदि गुरु या मेंटर का सम्मानपूर्ण डर (मर्यादा) न हो, तो शिष्य कभी सीख नहीं पाएगा। यह हमें सिखाता है कि प्रेम और स्वतंत्रता के बीच एक ‘अनुशासन’ की लकीर होना जरूरी है।
184. दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुःख काहे को होय।
अर्थ: दुःख आने पर हर कोई ईश्वर (या अपने मूल्यों) को याद करता है, लेकिन सुख में सब भूल जाते हैं। कबीर कहते हैं कि यदि व्यक्ति सुख के दिनों में भी उतना ही जागरूक और कृतज्ञ रहे, तो दुःख की स्थिति उत्पन्न ही क्यों होगी?
आज यह ‘Proactive Life’ का मंत्र है। हम डॉक्टर के पास तब जाते हैं जब बीमार पड़ते हैं, या योग तब करते हैं जब तनाव बढ़ जाता है। कबीर कहते हैं कि अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत (सुमिरन) का ध्यान तब रखें जब आप पूरी तरह स्वस्थ (सुख में) हों। यदि हम ‘Precaution’ को अपनी जीवनशैली बना लें, तो संकट की नौबत ही नहीं आएगी।
185. माला फ़ेरत जुग गया, मिटा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।।
अर्थ: हाथ में माला फेरते हुए युग बीत गए, लेकिन मन की चंचलता और विचार (मन का फेर) नहीं बदले। कबीर सलाह देते हैं कि हाथ की माला (लकड़ी के मोती) को छोड़कर अपने ‘मन’ के मोतियों को बदलो, यानी अपनी सोच और नियत को बदलो।
आज का संदर्भ: यह ‘Surface-level Branding’ पर प्रहार है। आज लोग योग की फोटो डालते हैं पर शांत नहीं रहते, मोटिवेशनल कोट्स पढ़ते हैं पर अमल नहीं करते। कबीर कहते हैं कि गैजेट्स, ऐप्स और बाहरी दुनिया को ‘ऑप्टिमाइज़’ करना छोड़ो, अपने ‘Inner Software’ (मन) को अपडेट करो। जब तक भीतर का नजरिया नहीं बदलेगा, जीवन की गुणवत्ता नहीं बदलेगी।
186. तन थिर मन थिर वचन थिर, सूरति निरति थिर होय।
कहैं कबीर उस पलक को, कल्प न पावै कोय।।
अर्थ: जब शरीर (तन), मन, वाणी (वचन) और पूरी चेतना (सूरति-निरति) एक जगह स्थिर (थिर) हो जाती है, तो वह क्षण इतना शक्तिशाली होता है कि उसकी बराबरी हजारों वर्षों (कल्प) का समय भी नहीं कर सकता।
आज इसे आधुनिक विज्ञान में ‘Flow State’ या ‘Deep Work’ कहा जाता है। आज के डिस्ट्रैक्शन (सोशल मीडिया, नोटिफिकेशन) के युग में अगर कोई व्यक्ति अपनी पूरी ऊर्जा एक लक्ष्य पर केंद्रित कर दे, तो वह थोड़े समय में वह परिणाम पा सकता है जो साधारण लोग पूरी जिंदगी में नहीं पाते। यह ‘एकाग्रता’ ही आज की दुनिया की सबसे महँगी मुद्रा (Currency) है।
187. गुरु कुम्हार शीष कुंभ है, गढ़ि- गढ़ काढ़ै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि गुरु एक कुम्हार के समान है और शिष्य मिट्टी के कच्चे घड़े (कुंभ) के समान। जैसे कुम्हार घड़े को सुंदर आकार देने के लिए भीतर से हाथ का सहारा देता है और बाहर से चोट मारता है ताकि उसकी कमियाँ (खोट) दूर हो सकें, वैसे ही गुरु शिष्य को कठोर अनुशासन में रखता है, पर भीतर से उसे प्रेम और ज्ञान का संबल प्रदान करता है।
भावार्थ (Deep Analysis):
- अनुशासन बनाम सहानुभूति (Discipline vs. Empathy): यह दोहा ‘Tough Love’ के मनोविज्ञान को दर्शाता है। बिना ‘बाहरी चोट’ (सख्त नियमों) के शिष्य का अहंकार नहीं टूटता, और बिना ‘आंतरिक सहारे’ (भावनात्मक समर्थन) के शिष्य टूट जाता है।
- सुधार की प्रक्रिया (The Process of Refinement): गुरु का उद्देश्य शिष्य को दुख देना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे ‘खोट’ (आलस, अज्ञान, विकार) को बाहर निकालना है। यह व्यक्तित्व के ‘निर्माण’ की प्रक्रिया है।
188. खाली साधु न बिदा करु, सुन लीजै सब कोय।
कहैं कबीर कछु भेंट धरु, जो तेरे घर होय।।
अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हे मनुष्यों! मेरी बात ध्यान से सुनो। यदि तुम्हारे द्वार पर कोई साधु या सज्जन पुरुष आए, तो उसे खाली हाथ विदा मत करो। जो कुछ भी तुम्हारे सामर्थ्य में हो, श्रद्धापूर्वक उन्हें भेंट करो।
भावार्थ: यहाँ ‘साधु’ का अर्थ केवल सन्यासी नहीं, बल्कि ‘अतिथि’ और ‘ज्ञान’ से भी है। यह दोहा कृतज्ञता (Gratitude) को दर्शाता है। जब कोई ज्ञानी आपके द्वार पर आता है, तो वह आपको विचार देकर जाता है; बदले में उसे सम्मान और सेवा देना आपका धर्म है। यह हमारे सामाजिक ताने-बाने में ‘दान’ की महत्ता को पुख्ता करता है।
189. साधु आवत देखि कर, हँसी हमारी देह।
माथा का ग्रह उतरा, नैनन बढ़ा सनेह।।
अर्थ: किसी सज्जन या संत को आते देखकर मेरा रोम-रोम (देह) प्रसन्नता से खिल उठता है। ऐसा लगता है जैसे मस्तक पर चढ़ा कोई भारी संकट या मानसिक तनाव (ग्रह) उतर गया हो और आँखों में प्रेम (सनेह) उमड़ आया हो।
भावार्थ: यह दोहा सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) के प्रभाव को समझाता है। जब हम किसी ऊँचे विचार वाले व्यक्ति से मिलते हैं, तो हमारा तनाव स्वतः कम हो जाता है। आँखों में ‘सनेह’ बढ़ने का अर्थ है कि हमारा दृष्टिकोण सहानुभूतिपूर्ण और प्रेमपूर्ण हो जाता है।
190. कथनी थोथी जगत में, करनी उत्तम सार।
कहैं कबीर करनी भली, उतरै भोजन पार।
अर्थ: इस संसार में कोरी बातें (कथनी) सारहीन और खोखली हैं। वास्तविक तत्व तो मनुष्य के कर्म (करनी) में है। कबीर कहते हैं कि श्रेष्ठ कर्म ही वह नौका है, जो मनुष्य को इस संसार रूपी भवसागर (भौजल) से पार उतार सकती है।
भावार्थ: यह दोहा Integrity (निष्ठा) का सबसे बड़ा सूत्र है। उपदेश देना सरल है, पर उस पर चलना कठिन। आज के दौर में जहाँ ‘दिखावा’ अधिक है, कबीर याद दिलाते हैं कि आपकी पहचान आपके शब्दों से नहीं, आपके कार्यों से होती है।जो कर्म में नहीं उतरता, वह ज्ञान नहीं, शोर है।चरित्र वही है जो व्यवहार में दिखे
191.सतगुरु मिला जु जानिए, ज्ञान उजाला होय।
भ्रम का भांडा तोड़ि करि , रहे निराला होय।।
अर्थ: सच्चा गुरु मिला है, यह तब पहचानना चाहिए जब आपके भीतर ज्ञान का प्रकाश (उजाला) फैल जाए। गुरु वह है जो आपके भ्रम और अज्ञान के घड़े (भांडा) को फोड़ दे और आपको संसार की भीड़ से अलग (निराला) अपनी वास्तविक पहचान करा दे।
भावार्थ: आज के सूचना के युग (Information Age) में गुरु वह नहीं जो आपको सिर्फ जानकारी दे, बल्कि वह है जो आपके ‘Confusion’ को ‘Clarity’ में बदल दे। जब आप अंधविश्वास और मानसिक गुलामी को छोड़ देते हैं, तभी समझना चाहिए कि आपको सही मार्गदर्शन मिला है।
192. गुरु कहावन कठिन है , लम्बा पेड़ खजूर।
चढ़ै तो चाखै प्रेम रस , गिरै तो चकनाचूर।।
अर्थ: गुरु कहलाना या गुरु का पद प्राप्त करना खजूर के ऊँचे पेड़ पर चढ़ने जैसा कठिन है। यदि कोई साधक उस ऊँचाई तक पहुँच जाए, तो वह ज्ञान और प्रेम के दिव्य रस का स्वाद चखता है। लेकिन यदि वह मार्ग में अपने अहंकार के कारण गिर जाए, तो उसका पतन इतना भयानक होता है कि वह ‘चकनाचूर’ हो जाता है।
भावार्थ: यह नेतृत्व (Leadership) की नैतिकता पर प्रहार है। गुरु या मार्गदर्शक बनना कोई पदवी नहीं, बल्कि एक भारी जिम्मेदारी है। यदि आप गुरु बनकर भ्रष्ट होते हैं या अपने आचरण से गिरते हैं, तो आपकी सामाजिक और आध्यात्मिक मृत्यु निश्चित है। यह ‘पाखंडी गुरुओं’ के लिए एक कड़ी चेतावनी है।गुरु का पद सम्मान नहीं, उत्तरदायित्व है।
193. साधु साधु सबहीं बड़े, अपनी अपनी ठौर।
शब्द विवेकी पारखी , ते माथे के मौर।।
- अर्थ: सभी साधु और सज्जन अपने-अपने स्थान पर महान हैं। लेकिन उनमें भी श्रेष्ठ (माथे के मौर/मुकुट) वे हैं, जो ‘शब्द’ के पारखी हैं और जिनके पास ‘विवेक’ (Discernment) है—यानी जो सत्य और असत्य का भेद करना जानते हैं।
- भावार्थ: कबीर यहाँ तर्क और विवेक को सर्वोच्च स्थान देते हैं।प्रश्न करने की क्षमता = सच्ची बुद्धि, केवल गेरुआ वस्त्र पहनने या उपदेश देने से कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता। श्रेष्ठ वह है जो शब्दों के पीछे छिपे मर्म को समझे और सत्य का निर्णय विवेक से ले। ऐसे ही लोग समाज का नेतृत्व करने के योग्य होते हैं।
194. गुरु गुरु सबहिं बड़े , अपनी अपनी ठौर।
करम जौं निष्ठा से करे , ते माथे का मौर।।
गुरु शब्द अपने आप में बहुत महान है , इसलिए सभी गुरु अपने अपने जगह पर बड़े हैं ; वे हैं, जो ‘शब्द’ के पारखी हैं और जिनके पास ‘विवेक’ (Discernment) है- यानी जो सत्य और असत्य का भेद करना जानते हैं।
भावार्थ: कबीर यहाँ तर्क और विवेक को सर्वोच्च स्थान देते हैं।प्रश्न करने की क्षमता = सच्ची बुद्धि, डिग्री लेकर शिक्षक बन सकता गुरु नहीं कोई श्रेष्ठ नहीं हो जाता। श्रेष्ठ गुरु वह है जो अपना कर्म निष्ठां से करेंगे ,जो शब्दों के पीछे छिपे मर्म को समझे और सत्य का निर्णय विवेक से ले। वही सबके माथे का मुकुट होंगे। ऐसे ही लोग समाज का नेतृत्व करने के योग्य होते हैं , हर क्षेत्र में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। जो व्यक्ति निष्ठा से अपने कर्म करता है, वही सच्चा सम्मान प्राप्त करता है।
195. कबीर कुसंग न कीजिए, पत्थर जल न तिराय।
कदली सीप भुजंग मुख , एक बून्द तीर भाय।।
अर्थ: कुसंगति कभी न करें, क्योंकि पत्थर स्वयं डूबता है और जो उसे पकड़ता है उसे भी ले डूबता है। स्वाति नक्षत्र की बारिश की एक ही बूंद जब केले (कदली) में गिरती है तो कपूर बनती है, सीप में गिरती है तो मोती बनती है, और सांप (भुजंग) के मुंह में गिरती है तो जहर बनती है।
भावार्थ: यह दोहा ‘Environment’ के महत्व को समझाता है। आपकी योग्यता (बूंद) वही रहती है, लेकिन आपकी संगति तय करती है कि आप ‘जहर’ बनेंगे या ‘मोती’।संगति ही तय करती है कि ज्ञान अमृत बनेगा या विष। गलत लोगों के साथ रहने से आपकी प्रतिभा और चरित्र दोनों नष्ट हो जाते हैं।
196. कामी तो निरभय भया , करै न काहू संक।
इंद्री केरे बसि पड़ा , भुगते नरक निसंक।।
अर्थ: वासना (Lust) में अंधा व्यक्ति समाज या मर्यादा का डर छोड़ देता है और निर्भय होकर गलत काम करता है। लेकिन वह वास्तव में स्वतंत्र नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों का गुलाम (बसि पड़ा) है। ऐसा व्यक्ति बिना किसी संदेह के नरक (मानसिक और सामाजिक पतन) की ओर जाता है।
भावार्थ: आज के दौर में ‘आजादी’ के नाम पर अनुशासनहीनता बढ़ रही है। कबीर कहते हैं कि इंद्रियों के वश में होना ‘आजादी’ नहीं, बल्कि सबसे बड़ी गुलामी है। जब व्यक्ति की वासना उसके विवेक पर हावी हो जाती है, तो उसका पतन निश्चित है।
197. कामी कबहुँ न गुरु भजै , मिटै न संसै सूल।
और गुनह सब बख्शिहैं , कामी डाल न मूल।।
अर्थ: जो व्यक्ति केवल वासनाओं में डूबा है, वह कभी गुरु (ज्ञान) का ध्यान नहीं कर सकता, क्योंकि उसका संशय और मानसिक पीड़ा (सूल) कभी खत्म नहीं होती। कबीर कहते हैं कि ईश्वर अन्य गलतियां (गुनह) तो माफ कर सकते हैं, लेकिन कामुकता या अनैतिकता जड़ (मूल) और शाखा (डाल) सबको नष्ट कर देती है।
भावार्थ: अध्यात्म और विलासिता एक साथ नहीं चल सकते। यदि मन में विकारों की धूल जमी है, तो ज्ञान का प्रतिबिंब वहां नहीं पड़ सकता। यह दोहा चारित्रिक शुद्धता (Integrity) पर जोर देता है।बाहरी सुधार से पहले आंतरिक संयम जरूरी है।आत्मअनुशासन ही मुक्ति का द्वार खोलती है।
198. मन के हारे हार है , मन के जीते जीत।
कहैं कबीर गुरु पाइये , मन ही के प्रतीत।।
अर्थ: जीवन में हार और जीत शारीरिक शक्ति से नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति से तय होती है। यदि आपका मन थककर हार मान लेता है तो आपकी हार हो जाती है। और यदि आपका मन उत्साहित होकर जीत की ठान लेता है तो यदि आपका मन उत्साहित होकर जीत की ठान लेता है तो निश्चित आपकी जीत होती है। कबीर कहते हैं कि इसी प्रकार जब आप सच्चे गुरु से मिलने की ठान लेते हैं तो सदगुरु आपको मिलकर ही रहते हैं।गुरु और सत्य की प्राप्ति भी तभी संभव है जब मन में उनके प्रति पूर्ण विश्वास (प्रतीत) हो।
आज के Psychology और Motivation का मूल मंत्र है। आपकी ‘Self-belief’ ही आपकी सीमाएं तय करती है। सफलता पहले दिमाग में जीती जाती है, फिर मैदान में।
199. महमंता मन मारि ले , घट की माँहिं घेर।
जब ही चालै पीठ दे , आँकुस दे दे फेर।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि यह मन मदमस्त हाथी (महमंता) के समान है, इसे विवेक की शक्ति से वश में करके अपने हृदय (घट) के भीतर ही घेर कर रख। जैसे ही यह हाथी लक्ष्य से पीठ फेरकर बाहर की ओर भागे, वैसे ही ज्ञान रूपी ‘अंकुश’ मारकर इसे वापस सही रास्ते पर ले आ।
आज के दौर में हमारा मन ‘डिजिटल डिस्ट्रैक्शन’ (Digital Distraction) का शिकार है। यह हाथी की तरह कभी इंस्टाग्राम, कभी यूट्यूब तो कभी व्यर्थ की चिंताओं की ओर भागता है। कबीर यहाँ ‘Mindfulness’ की बात कर रहे हैं- जैसे ही मन भटके, उसे सचेत होकर वापस काम पर लगाओ।
200. पहिले यह मन काग था , करता जीवन घात।
अब तो मन हंसा भया , मोती चुनि चुनि खात।।
अर्थ: पहले मेरा यह मन कौए (काग) के समान था, जो केवल गंदगी और विकारों (कचरे) की तलाश में रहता था और मेरे आध्यात्मिक जीवन का नाश (घात) कर रहा था। लेकिन साधना और ज्ञान के प्रभाव से अब यही मन ‘हंस’ बन गया है, जो केवल सत्य और विवेक रूपी ‘मोती’ ही चुनकर खाता है।
आज (Content Consumption): हम क्या पढ़ते हैं और क्या देखते हैं, वही हमारा मन बन जाता है। यदि हम ‘कौए’ की तरह नकारात्मक खबरें और गॉसिप चुनेंगे, तो जीवन दुखी होगा। यदि हम ‘हंस’ की तरह प्रेरणादायक और रचनात्मक विचार चुनेंगे, तो हमारा व्यक्तित्व दिव्य हो जाएगा।
201. जा गुरु तेन भ्रम ना मिटे , भ्रान्ति न जिवकी जाय।
सो गुरु झूठा जानिए ,त्यागत देर ना लाय।।
जो गुरु आपकी जिज्ञासाओं को शांत न कर सके , उसे झूठा समझें और उसका अविलम्ब त्याग कर दें, क्योंकि वहां आपका समय व्यर्थ होगा।
अर्थ: जिस गुरु के सानिध्य में रहने के बाद भी मन का संशय (भ्रम) खत्म न हो और जीवन की उलझनें (भ्रांति) दूर न हों, उस गुरु को पाखंडी या अज्ञानी समझना चाहिए। ऐसे गुरु को छोड़ने में एक पल की भी देरी नहीं करनी चाहिए।
(Critical Thinking): आज के ‘इन्फ्लुएंसर’ और ‘सेल्फ-हेल्प गुरुओं’ के युग में यह दोहा बहुत सटीक है। यदि कोई आपको और अधिक भ्रमित कर रहा है या डरा रहा है, तो वह गुरु नहीं है। सच्चा मेंटर वह है जो आपके दिमाग की खिड़कियां खोल दे, न कि आपको अपनी मानसिक गुलामी में बांध ले।
202. गुरु नाम है गम्य का , शीष सीख ले सोय।
बिनु पद बिनु मरजाद नर, गुरु शीष नहिं कोय।।
गुरु सीख देते हैं और शिष्य ग्रहण करते हैं। इन दोनों की अपनी अपनी मर्यादाएँ हैं और इसी के अनुसार अपने धर्म का निर्वहन करना चाहिए।
अर्थ: ‘गुरु’ शब्द का वास्तविक अर्थ है ‘गम्य’ (जहाँ पहुँचा जा सके, यानी लक्ष्य या ज्ञान का मार्ग)। शिष्य को गुरु से वही ज्ञान और आचरण सीखना चाहिए। कबीर स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति अपने पद की गरिमा और आचरण की मर्यादा में नहीं रहता, वह न तो गुरु कहलाने योग्य है और न ही शिष्य।
आज शिक्षण हो या कॉर्पोरेट ट्रेनिंग,(Professional Integrity), सफलता केवल तकनीक सीखने से नहीं आती। यदि सिखाने वाले और सीखने वाले के बीच ‘Ethics’ (मर्यादा) और आपसी सम्मान नहीं है, तो वह ज्ञान कभी फलदायी नहीं होता। मर्यादाहीन व्यक्ति कभी विद्या का पात्र नहीं बन सकता।
जो मन को साध ले, वही गुरु को पहचानता है।
जो गुरु को पहचान ले, वही भ्रम से मुक्त होता है।
203. जिन ढूंढ़ा तिन पाइयाँ , गहिरे पानी पैठ।
मैं बपुरा बूड़न डरा , रहा किनारे बैठ।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि जिन्हें सत्य या सफलता की चाह थी, उन्होंने उसे गहरे पानी में गोता लगाकर ढूंढ ही लिया। लेकिन मैं बेचारा (बपुरा) डूबने के डर से किनारे पर ही बैठा रह गया और खाली हाथ रहा।
भावार्थ:आज यह दोहा ‘Calculated Risk’ और ‘Commitment’ की बात करता है। मोती किनारे पर नहीं मिलते, उनके लिए समुद्र की गहराई में जाना पड़ता है।जो लोग असफलता के डर से नई शुरुआत नहीं करते, वे कभी महान उपलब्धियाँ हासिल नहीं कर पाते। सफलता सुरक्षित ‘कम्फर्ट जोन’ (किनारे) में नहीं, बल्कि चुनौतियों के गहरे पानी के भीतर छिपी होती है।
204. हिरदे ज्ञान न उपजै , मन परतीत न होय।
ताको सदगुरु कहा करे, घनघसि कुल्हड़ न होय।।
अर्थ: यदि शिष्य के हृदय में स्वयं ज्ञान प्राप्त करने की तड़प न हो और मन में गुरु के प्रति अटूट विश्वास (परतीत) न हो, तो बेचारा सद्गुरु भी क्या कर सकता है? यह वैसा ही है जैसे पत्थर को कितना भी घिसा जाए, वह मिट्टी का मुलायम कुल्हड़ (पात्र) नहीं बन सकता।
भावार्थ: सीखने की प्रक्रिया में शिक्षक से ज्यादा महत्वपूर्ण विद्यार्थी की मानसिकता है। यदि मन पत्थर की तरह कठोर और अहंकारी है, तो दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञानी भी आपको कुछ नहीं सिखा सकता।
आज का संदर्भ: यह ‘Coachability’ का सिद्धांत है। कॉर्पोरेट ट्रेनिंग हो या शिक्षा, यदि सीखने वाला ‘ओपन-माइंडेड’ नहीं है, तो संसाधनों का कोई मूल्य नहीं है। ज्ञान ग्रहण करने के लिए आपको पत्थर नहीं, मिट्टी (लचीला) बनना होगा।
आज सिखाने वाला श्रेष्ठ हो, पर सीखने की इच्छा न हो—तो परिणाम शून्य,
अहंकार, शंका और जिद ज्ञान को प्रवेश नहीं करने देते ,आत्म-खुलापन (openness) सबसे बड़ी योग्यता है
205. कबीर हरिरस बरसिया , गिरी परवत सिखराय।
नीर निवानू ठाहरै , ना वह छापर डाय।।
अर्थ: कबीर कहते हैं कि ईश्वर की कृपा (हरिरस) की वर्षा तो ऊँचे पर्वतों के शिखरों पर भी उतनी ही होती है जितनी नीची भूमि पर। लेकिन पानी पहाड़ों की चोटियों पर नहीं रुकता, वह नीचे की ओर बह जाता है और केवल गड्ढों या नीची भूमि (निवानू) में ही ठहरता है।
भावार्थ: यहाँ ‘पर्वत की चोटी’ अहंकार का प्रतीक है और ‘नीची भूमि’ विनम्रता का। ज्ञान और ईश्वर की कृपा हर जगह बरसती है, लेकिन वह ठहरती केवल उसके पास है जो विनम्र है। अभिमानी व्यक्ति ज्ञान को पकड़कर नहीं रख सकता।
आज का संदर्भ: जो व्यक्ति खुद को “सर्वज्ञानी” समझकर अहंकार के पहाड़ पर बैठा है, वह कभी नया ज्ञान संचित नहीं कर पाएगा। नया सीखने के लिए खुद को खाली और विनम्र (नीचे) रखना पड़ता है।प्रतिभा से अधिक विनम्रता ज़रूरी है।
,अहंकारी व्यक्ति अवसर पाकर भी खाली रह जाता है, जो सीखने को झुका, वही आगे बढ़ा है।
निष्कर्ष: कबीर के दर्शन का वैश्विक सार
संत कबीरदास के दोहे मात्र मध्यकालीन काव्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक ‘प्रैक्टिकल गाइड’ हैं। उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि कबीर का दर्शन किसी एक धर्म, जाति या संप्रदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है। उनके दोहों में हमें आत्म-सुधार, सामाजिक समानता और मानसिक शांति के वे सूत्र मिलते हैं, जिनकी प्रासंगिकता आज के तनावपूर्ण युग में और भी बढ़ गई है।
यह लेख कबीर के दोहों के माध्यम से जीवन, समाज और आत्मा की गहरी पड़ताल करता है। इन दोहों का निष्कर्ष यही है कि कबीर केवल कवि नहीं, बल्कि मानव चेतना के जाग्रत मार्गदर्शक हैं। वे मनुष्य को बाहरी आडंबरों से हटाकर भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करते हैं। कबीर के अनुसार जीवन की दिशा मन तय करता है—यदि मन शुद्ध है, तो कर्म स्वतः शुद्ध हो जाते हैं। इसलिए आत्म-सुधार का पहला कदम मन पर नियंत्रण है।
कबीर यह स्पष्ट करते हैं कि संगति केवल लोगों की नहीं, विचारों की भी होती है। जैसे विचार होंगे, वैसा ही जीवन बनेगा। गुरु का महत्व, अहंकार का त्याग, करुणा, क्षमा और सत्य—ये सब कबीर के दर्शन के केंद्र में हैं। वे जाति, धर्म, संप्रदाय और कर्मकांड के सख्त विरोधी हैं और मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। उनके लिए न मंदिर, न मस्जिद—ईश्वर हर श्वास, हर हृदय में निवास करता है।
कबीर का संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जब समाज भोगवाद, प्रतिस्पर्धा, तनाव, अहंकार और विभाजन से जूझ रहा है। वे चेताते हैं कि केवल धन, पद या जन्म से कोई महान नहीं बनता—महानता आचरण, संवेदना और सेवा से आती है। जो दूसरों के दुख को समझता है, वही सच्चा मनुष्य है।
कबीर यह भी सिखाते हैं कि इच्छाओं का अंत ही शांति की शुरुआत है। जो कुछ नहीं चाहता, वही सच्चा शहंशाह है। आलोचना से सीखना, दुर्बल पर दया करना, बुराई के बदले भलाई करना—ये सब गुण व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाते हैं।
कबीर ने मन के नियंत्रण (जैसे “तन पंछी भया”) और निरंतर अभ्यास (जैसे “करत-करत अभ्यास के”) को सफलता की पहली सीढ़ी माना है। वे हमें सिखाते हैं कि बाहरी आडंबरों, मूर्ति-पूजा या कर्मकांडों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक शुद्धता और सेवा भाव है। जब वे कहते हैं कि “निंदक नियरे राखिये”, तो वे हमें आत्म-समीक्षा की शक्ति देते हैं, जो आज के लीडरशिप और पर्सनालिटी डेवलपमेंट का मूल आधार है।
उनका समभाव (Equanimity) अद्भुत है—जहाँ वे राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान, सबको एक ही परमात्मा की संतान मानते हैं। “कबीरा खड़ा बाजार में” के माध्यम से वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ द्वेष नहीं बल्कि करुणा का वास हो। कबीर की वाणी हमें याद दिलाती है कि डिग्री या कुल से कोई महान नहीं होता, बल्कि व्यक्ति की पहचान उसके ऊँचे कर्मों और व्यवहार से होती है।
अंततः, कबीर का निष्कर्ष यही है कि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए अहंकार त्यागकर (शीश दियो जो गुरु मिले) प्रेम और सत्य की राह पर चलना ही जीवन की सार्थकता है। उनके शब्द आज भी हमें ‘राई’ से ‘सुमेरु’ बनने का मार्ग दिखाते हैं, बशर्ते हम केवल उन्हें पढ़ें नहीं, बल्कि अपने आचरण में उतारें।
अंततः कबीर का दर्शन हमें यह समझाता है कि जीवन केवल जीने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जागने की यात्रा है। जो जाग गया, वही वास्तव में जी रहा है। कबीर हमें आत्मबोध, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने का साहस देते हैं—यही इस लेख का सार और निष्कर्ष है।